योग

स्वस्थ तन एवं मन की प्राप्ति हेतु भारतीय साधना पद्धति।योगः कर्मशु कौशलम्

योग, प्राचीन भारत में उद्भूत शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्रिया है जिसका उद्देश्य मन को स्थायी शान्ति प्रदान करना है ताकि आत्मसाक्ष्त्कार किया जा सके। पतंजलि द्वारा रचित 'योगसूत्र' योग का प्रधान ग्रन्थ है। योगदर्शन, भारत के छः आस्तिक दर्शनों में से एक है। १९वीं और २०वीं शताब्दी में भारत से निकलकर अनेक योग-गुरु पश्चिमी देशों में जाकर योग का प्रचार-प्रसार किये।

आसन, योग के आठ अंगों में से एक है। सर्वाङ्गासन = सभी अंगों का आसन

उक्तियाँ

सम्पादन
  • योगः चित्तवृत्तिनिरोधः -- पतञ्जलि योगसूत्र
अर्थ : चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
  • योगः समाधिः -- वेद व्यास
योग नाम समाधि का है।
  • साङ्ख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते ।
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ -- महाभारत
सांख्य के वक्ता कपिलाचार्य परमर्षि कहलाते हैं और योग के वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, इनसे पुराना और कोई वक्ता नहीं है।
  • इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तपः ॥
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ (गीता 4/1-3)
अर्थात- इस अविनाशी योग को मैंने विवस्वान (सूर्य) के प्रति कहा, विवस्वान ने अपने पुत्र मनु से कहा था और मनु के अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा । हे परन्तप अर्जुन इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों द्वारा जाना गया किन्तु इसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्त हो गया । तू मेरा प्रिय भक्त एवं सखा है इसलिए वही पुरातन योग आज मैंने तुझे बताया है, क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है। अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है।
  • हिरण्यगर्भो द्युतिमान य एषच्छन्दशि स्तुतः।
योगैः सम्पुज्यते नित्यं स च लोके विभु: स्मृतः॥ -- महाभारत
यह द्युतिमान हिरण्यगर्भ वही है जिसकी वेदों में स्तुति की गयी है, जिनकी योगी लोग नित्य पूजा किया करते हैं और संसार में जिन्हें " विभु " कहते हैं।
  • ध्यान योगेन सम्यश्यदगतिस्यान्तरामनः। -- मनुस्मृति 16/731
अर्थ : ध्यान योग से भी योग आत्मा को जाना जा सकता है। अतः योगपरायण ध्यान होना चाहिए।
  • यदा पंचावतिष्ठनते ज्ञानानि मनसा सह।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमा गति॥
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम्।
अप्रमत्तस्दा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ॥ -- कठोपनिषद-2/3/10-11
अर्थात् जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती हैं, और मन निश्चल बुद्धि के साथ आ मिलता है, इस अवस्था को परमगति कहते है। इन्द्रियों की स्थिर धारणा ही योग है। जिसकी इन्द्रियाँ स्थिर हो जाती हैं, उसमें शुभ संस्कारों की उत्पत्ति और अशुभ संस्कारों का नाश होने लगता है। यही अवस्था योग की है।
  • पुरूष प्रकृत्योतियोगेऽपि योग इत्यभिधीयते। -- सांख्यशास्त्र
अर्थात् प्रकृति-पुरुष का पृथकत्व स्थापित कर, अर्थात् दोनो का वियोग करके पुरुष के स्वरुप में स्थिर हो जाना योग है।
  • श्रद्धाभक्तियोगावदेहि। -- कैवल्योपनिषद्
अर्थात् श्रद्धा भक्ति और ध्यान के द्वारा आत्मा को जानना ही योग है।
  • संयोगो योग इत्यक्तो जीवात्मापरमात्मनोः। -- याज्ञवल्क्य स्मृति
अर्थात् जीवात्मा परमात्मा के मिलन को योग कहते हैं।
  • अयं तु परमोधर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम्। -- याज्ञवल्क्य स्मृति
‘योग’ के द्वारा आत्म दर्शन करना ही परमधर्म है।
  • ब्रह्म प्रकाशकं ज्ञानं योगस्तत्रैकचित्तता।
चित्तवृत्तिनिरोधश्च जीवब्रह्मात्मनो परः॥ -- अग्नि पुराण 183/1-2
अर्थात् ज्ञान का प्रकाश पड़ने पर चित्त ब्रह्म में एकाग्र हो जाता है। जिससे जीव का ब्रह्म में मिलन हो जाता है। ब्रह्म में चित्त की यह एकाग्रता ही योग है।
  • जीवात्मा परमार्थोऽयमविभागः परमतपः
सः एव परोयोगः समासा कथितस्तव॥ -- स्कन्धपुराण
अर्थात् जीवात्मा व परमात्मा का अलग-अलग होना ही दुःख का कारण है। और इस का अपृथक भाव ही योग है। एकत्व की स्थिति ही योग है।
  • योग निरोधो वृत्तेस्तु चितस्य द्विज सत्तमा। -- लिङ्गपुराण
अर्थात् चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाना, उसे पूर्ण समाप्त कर देना ही योग है। उसी से परमगति अर्थात् ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
  • तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः। -- वैशेषिक सूत्र 6/2/16
अर्थात् मन आत्मा में स्थिर होने पर उसके (मन के काय का) अनारम्भ है, वह योग है।
  • योगस्थः कुरु कर्माणि संगत्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ -- गीता 2/48
अर्थात् योग में स्थिर हो कर कर्म फल का त्याग करे और सिद्ध-असिद्ध में सम होकर कर्मों को करे, यही समता ही योग है।
  • बुद्धि युक्तो जहातीह उभय सुकृत दुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥ -- गीता 2/50
अर्थात् कर्मो में कुशलता का नाम ही योग है। कर्मों की कुशलता का तात्पर्य यह है कि हमे कर्म इस प्रकार से करने चहिए कि वे बन्धन का कारण ना बनें। अनासक्त भाव से अपने कर्तव्य कर्मों का निर्वहन करना ही कर्म योग है।
  • तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥ -- गीता 6.23
अर्थात् उस योग को उत्साह, श्रद्धा, धैर्य, से समाहित चित्त से निश्चय पूर्वक करना चाहिए। इस दुख रुप संसार के संयोग से रहित है, वह योग है।
  • एकत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च।
सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते॥ -- मैत्रायणी उपनिषद् 6/25
अर्थात् प्राण, मन व इन्द्रियों का एक हो जाना, एकाग्रावस्था को प्राप्त कर लेना, बाह्म विषयों से विमुख होकर इन्द्रियों का मन में और मन आत्मा में लग जाना, प्राण का निष्चल हो जाना योग है।
  • योऽपानप्राणयोरैक्यं स्वरजोरेतसोस्तथा।
सूर्याचन्द्रमसोर्योगो जीवात्मपरमात्मनो:।
एवंतु़द्वन्द्व जालस्य संयोगो योग उच्यते॥ -- योगशिखोपनिषद् 1/68-69
अर्थात् अपान और प्राण की एकता कर लेना, स्वरज रूपी महाशक्ति कुण्डलिनी को स्वरेत रूपी आत्मतत्त्व के साथ संयुक्त करना, सूर्य अर्थात् पिंगला और चन्द्र अर्थात् इड़ा स्वर का संयोग करना तथा परमात्मा से जीवात्मा का मिलन योग है।
  • योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्धते।
योऽप्रमत्तस्तु योगेन स योगी रमते चिरम्॥ -- सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत
योग (शास्त्र जो मन को संतुलित करता है) केवल योग द्वारा (उसके अनुशासन का अभ्यास करके) ज्ञात होता है। इसके प्रायोगिक अभ्यास से ही योग का विकास होता है। योग के लम्बे अभ्यास से जो साधक सदैव सतर्क बन जाता है, वह निःसंशय सदैव आनन्दी रहता है।
  • सलिबे सैन्धवं यद्वत साम्यं भजति योगत:।
तयात्ममनसोरैक्यं समाधिरभी घीयते॥ -- हठयोग प्रदीपिका (4/5)
अर्थात् जिस प्रकार नमक जल में मिलकर जल की समानता को प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार जब मन वृत्तिशून्य होकर आत्मा के साथ ऐक्य को प्राप्त कर लेता है तो मन की उस अवस्था का नाम समाधि है।
  • बुद्धया भयं प्रणुदति तपसा विन्दते महत्।
गुरुशुश्रूषया ज्ञानं शान्तिं योगेन विन्दति॥
इस जगत् में मनुष्य बुद्धि से डर को दूर कर सकता है , तपस्या के द्वारा महत्त्व को प्राप्त कर सकता है , गुरुजनों की सेवा से ज्ञान तथा योग के द्वारा शक्त्ति प्राप्त कर सकता है।
  • योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्तनम् ।
मोक्षे निवृत्तिः निःशेषा योगो मोक्षप्रवर्तकः ॥ -- चरकसंहिता 1.137
मोक्ष होने पर वेदनाओं से पूर्ण निवृत्ति हो जाती है, योग मोक्ष का प्रवर्तक है।
  • मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् । -- योगसूत्र 33
सुख, दुख, पुण्य, अपुण्य विषयों में क्रमशः मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा का भाव रखने से चित्त प्रसन्न होत है।
अर्थात सुखी व्यक्तियों के प्रति मित्रता की, दुःखी व्यक्तियों के प्रति करुणा अर्थात कृपा की, पुण्य आत्माओं या सज्जन व्यक्तियों के प्रति प्रसन्नता की व पापी या दुष्ट व्यक्तियों के प्रति उपेक्षा अर्थात उदासीनता की भावना अथवा व्यवहार रखने से चित्त प्रसन्न व एकाग्र होता है। [१]
  • अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः। -- योगसूत्र, साधनापाद
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश - ये पाँच क्लेश हैं।
अस्मिता = देखने की शक्ति (दृक शक्ति) और दर्शन शक्ति का एक हो जाना, अर्थात् मिथ्या/भ्रम समझने की शक्ति क लुप्त हो जाना
अभिनिवेश = मृत्य का भय
  • मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते ॥ -- महोपनिषद, ५-४२
मन की पूर्णतया शान्ति के साधन को योग कहा गया है।
  • इन्द्रियार्थाश्रया बुद्धिज्ञनिं स्वागमपूर्वकम् ।
सदनुष्ठानव चचैतदसम्मोहोऽभिधीयते ॥
रत्नोपलम्भतज्ज्ञानतत्प्राप्त्यादि यथाक्रमम् ।
दूदोदाहरणं साधु ज्ञेयं बुद्ध्यादिसिद्धये ॥ -- हरिभद्रसूरि कृत योगदृष्टिसमुच्चय ११९-१२०
(गीता में 'बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः' पद आता है।) हरिभद्र इस पद को लेकर बुद्धि की अपेक्षा ज्ञान की कक्षा और ज्ञान की अपेक्षा असम्मोह की कक्षा कैसी ऊँची है - यह रत्न की उपमा देकर समझाते हैं और अन्त में कहते हैं कि सदनुष्ठान में परिणत होने वाला आगम ज्ञान ही असम्मोह है।
  • यमदिषु कृताभ्यासो निःसंगो निर्ममो मुनिः।
रागादिक्लेशनिर्मुक्तं करोति स्ववशं मनः॥
एक एवं मनोरोधः सर्वाभ्युदयसाधकः।
यमेवालम्ब्य संप्राप्ता योगिनस्तत्त्वनिश्चयम्॥
मनःशुद्धयेव शुद्धिः स्वाद् देहिनां नात्र संशयः।
वृथा तद्व्यतिरेकेण कायस्यैव कदर्थनम्॥ -- शुभचन्द्राचार्य विरचित ज्ञानार्णव प्रत्र 22 श्लोत्र 3, 12, 14
जिसने यमादिक का अभ्यास किया है, परिग्रह और ममता से रहित है ऐसा मुनि ही अपने मनको रागादि से निर्मुक्त तथा वश करने में समर्थ होता है। निस्सन्देह मन की शुद्धि से ही जीवों की शुद्धि होती है, मन की शुद्धि के बिना शरीर को क्षीण करना व्यर्थ है। मन की शुद्धि से इस प्रकार का ध्यान होता है, जिससे कर्मजाल कट जाता हैं एक मन का निरोध ही समस्त अभ्युदयों को प्राप्त कराने वाला है; मन के स्थिर हुए बिना आत्मस्वरूप में लीन होना कठिन है। अतएव योगांगों का प्रयोग मन को स्थिर करने के लिए अवश्य करना चाहिए। यह एक ऐसा साधन है, जिससे मन स्थिर करने से सबसे अधिक सहायता मिलती है।
  • मोक्षेण योजनाद् योगः, सर्वोप्याचार इष्यते।
विशिष्य स्थानवर्णार्थालम्बनैकाग्रयगोचरः॥ -- ज्ञानसारचयनिका-८४
मोक्ष के साथ योजित करने के कारण समस्त आचार ‘योग’ कहलाता है। उस योग के पांच प्रकार हैं -स्थान (आसन) वर्ण, अर्थज्ञान, आलम्बन तथा एकाग्रता।
  • स्थिरसुखमासनम् -- पतंजलि (योगसूत्र)
सुखपूर्वक स्थिरता से बैठने का नाम आसन है। या, जो स्थिर भी हो और सुखदायक अर्थात् आरामदायक भी हो, वह आसन है।
  • तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः॥ -- पतंजलि (योगसूत्र)
श्वास प्रश्वास के गति को अलग करना प्राणायाम है।
  • चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्॥ -- हठयोगप्रदीपिका
अर्थात प्राणों के चलायमान होने पर चित्त भी चलायमान हो जाता है और प्राणों के निश्चल होने पर मन भी स्वत: निश्चल हो जाता है और योगी स्थाणु हो जाता है। अतः योगी को श्वांसों का नियंत्रण करना चाहिये।
  • पवन ही जोग पवन ही भोग, पवन ही हरै छतीसौं रोग।
या पवन कोई जाणे भेव, सो आपे करता आपे देव ॥ -- गुरु गोरखनाथ
पवन ही योग है, पवन ही भोग है, और पवन ही छत्तीसों (सभी) रोगों को नष्ट करता है। जो कोई पवन की प्रकृति को जानता है वह स्वयं कर्ता (विधाता) है और स्वयं ही देवता है।
  • जीवन को बिना खोए भगवान की प्राप्ति योग है। -- महर्षि अरविन्द
  • महर्षि पतंजलि प्रणीत अष्टांग योग के आसन समेत सभी अंगों को स्वामी विवेकानंद बहुत महत्वपूर्ण मानते थे। उनका मानना था कि योग के उच्चतर अंगों में जाने से पहले आसन का अभ्यास बहुत महत्वपूर्ण है। स्वामी जी कहते हैं, "यम और नियम के बाद आसन आता है। जब तक बहुत उच्च अवस्था की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब तक रोज़ नियमानुसार कुछ शारीरिक और मानसिक क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। अतएव जिससे दीर्घकाल तक एक भाव से बैठा जा सके, ऐसे एक आसन का अभ्यास आवश्यक है। जिनको जिस आसन से सुभीता मालूम होता हो, उनको उसी आसन पर बैठना चाहिए। एक व्यक्ति के लिए एक प्रकार से बैठकर सोचना सहज हो सकता है, परन्तु दूसरे के लिए, सम्भव है, वह बहुत कठिन जान पड़े।"[२]

स्वामी विवेकानन्द का मत है कि ध्यान-धारणा आदि के लिए सीधे बैठना अत्यन्त आवश्यक है। उनके अनुसार "आसन के सम्बन्ध में इतना समझ लेना होगा कि मेरुदण्ड को सहज भाव से रखना आवश्यक है–ठीक सीधा बैठना होगा–वक्ष, ग्रीवा और मस्तक सीधे और समुन्नत रहें, जिससे देह का सारा भार पसलियों पर पड़े। यह तुम सहज ही समझ सकोगे कि वक्ष यदि नीचे की ओर झुका रहे, तो किसी प्रकार का उच्च चिंतन करना संभव नहीं।"[२] वे अन्यत्र आसन के इसी रूप पर ज़ोर देते हुए कहते हैं, "आसन के बारे में इतना ही समझ लेना चाहिए कि वक्षस्थल, ग्रीवा और सिर को सीधे रखकर शरीर को स्वच्छंद भाव से रखना होगा।"[३] -- स्वामी विवेकानन्द
  • निःस्वार्थ भावना से कर्म करना ही सच्चे धर्म का पालन है, और यही वास्तविक योग है। -- गुरु ग्रन्थ साहिब
  • शिव व शक्ति का मिलन को योग कहते हैं। -- रागेय राधव, ‘गोरखनाथ और उनका युग’ में
  • संसार सागर से पार होने की युक्ति का नाम ही योग है। -- योग वाशिष्ठ
  • योग के द्वारा मनुष्य अपने वास्तविक स्वरुप सद्-चित्-आनन्द का अनुभव कर लेता है। -- महर्षि वशिष्ठ
  • अपना अभ्यास करो और सब कुछ आ रहा है। -- श्री के पट्ठाबी जॉइस
  • आज के इस भागमभाग भरी जिन्दगी में हम सब अपने आप से ही अलग हो गये है इसलिए योग हमें अपने आप से पुन: जोड़ने में में मदद करता है।
  • आप कौन हैं इस बारे में उत्सुक होने के लिए योग एक सही अवसर है। -- जेसन क्रैंडल
  • आप योग नहीं कर सकते। योग आपकी प्राकृतिक अवस्था है। आप जो कर सकते हैं वो है योग व्यायाम , जो ये उजागर कर सकता है कि आप कहाँ अपनी प्राकृतिक अवस्था का विरोध कर रहे हैं। -- शेरोन गैनन
  • आपका मन आपका औज़ार है। इसका मालिक बनना सीखें गुलाम नहीं। -- अज्ञात
  • एक फोटोग्राफर लोगों से उसके लिए पोज दिलवाता है। एक योग प्रशिक्षक लोगों से खुद के लिए पोज दिलवाता है। -- टी गिलेमेट्स
  • एक सर्जन हमेसा गर्भवती महिलाओं को योग का अभ्यास करने के लिए सलाह देता हैं क्योंकि योग के द्वारा उन्हें स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।
  • एलर्जी को रोकने के लिए ऊर्जा उत्पन्न करें। -- बाबा रामदेव
  • कर्म योग में कभी कोई प्रयत्न बेकार नहीं जाता, और इससे कोई हानि नहीं होती। इसका थोड़ा सा भी अभ्यास जन्म और मृत्यु के सबसे बड़े भय से बचाता है। -- भगवद गीता
  • कर्म योग वास्तव में एक बड़ा रहस्य है। योग मन की दुखो की समाप्ति है। -- भगवद गीता
  • कहा जाता है कि एक व्यक्ति को योग के द्वारा स्वयं के साथ मिलना है जब पूरी तरह अनुशासित होकर अपने मन से सभी इच्छाओं से नियन्त्रण प्राप्त कर लेते हैं तब हम अपने आप को जान पाते है।
  • जब आप सांस लेते हैं , आप भगवान से शक्ति ले रहे होते हैं। जब आप सांस छोड़ते हैं तो ये उस सेवा को दर्शाता है जो आप दुनिया को दे रहे हैं। -- बी के एस आयंगर
  • जब तक आपने अभ्यास नहीं किया है , सिद्धांत बेकार है। अभ्यास करने के बाद, सिद्धांत ज़ाहिर है। -- डेविड विलियम्स
  • जब पुछा गया उसे अपने जन्मदिन पर क्या उपहार चाहिए , योगी बोला : मुझे किसी उपहार की नहीं बस आपके उपस्थिति की कामना है। -- अज्ञात
  • जब सांसें विचलित होती हैं तो मन भी अस्थिर हो जाता है। लेकिन जब सांसें शांत हो जाती हैं , तो मन भी स्थिर हो जाता है, और योगी दीर्घायु हो जाता है। इसलिए , हमें श्वास पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए। -- हठयोग प्रदीपिका
  • जो कोई भी अभ्यास करता है वह योग में सफलता पा सकता है लेकिन वो नहीं जो आलसी है। केवल निरंतर अभ्यास ही सफलता का रहस्य है। -- स्वात्मरामा
  • जो कोई व्यक्ति भी अभ्यास करता है वह योग के द्वारा सफलता प्राप्त कर सकता है लेकिन आलसी व्यक्ति के लिए योग का कोई महत्व नहीं है और निरंतर अभ्यास अकेले सफलता का रहस्य है।
  • धन्य हैं वे लचीले लोग, क्योंकि उनके आकार को नहीं बिगड़ना पड़ेगा। -- अज्ञात
  • ध्यान का बीज बोएं और मन की शांति का फल पाएं। -- अज्ञात
  • ध्यान से ज्ञान आता है; ध्यान की कमी अज्ञानता लाती है। अच्छी तरह जानो कि क्या तुम्हे आगे ले जाता है और क्या तुम्हे रोके रखता है, और उस पथ को चुनो जो ज्ञान की ओर ले जाता है। -- बुद्ध
  • ध्यान से परे ‘अब’ का अनुभव है। -- रयान पैरेंटी
  • नियमित योग अभ्यास करने से मनुष्य को तनाव से दूर रहने में तो मद्द मिलती ही है साथ ही बुरे दौर से उभरने में भी मद्द मिलती है। योग मनुष्य को एक खुशहाल और समृद्ध जीवन प्रदान करने में अपनी प्रमुख भूमिका निभाता है।
  • प्राणायाम बुनियादी सांस लेने का व्यायाम है जो ऑक्सीजन को तुम्हारे शरीर के सभी भागों तक पहुँचाने में मदद करता है जिससे न सिर्फ कोशिकाओं को फिर से जीवंत कर देता है बल्कि तुम्हारे अंदर बहुत सारी ऊर्जा भी भर देता है। मेरे अनुसार , एक इंसान को छः घंटे सोना, एक घंटा योग , एक घंटा दैनिक दिनचर्या , दो घंटा परिवार और १४ घंटा कड़ी मेहनत करना चाहिए। -- बाबा रामदेव
  • बाहर क्या जाता है उसे आप हमेशा कंट्रोल नहीं कर सकते हैं। लेकिन अंदर क्या जाता है उसे आप हमेशा कंट्रोल कर सकते हैं। -- श्री योग
  • मन की शांति के लिए सबसे अच्छा साधन योग हैं।
  • मेरे लिए, योग सिर्फ एक कसरत नहीं है – यह अपने आप पर काम करने के बारे में है। -- मैरी ग्लोवर
  • मैं योग को प्यार करता हूँ क्योंकि यह न केवल यह हमारे शरीर के लिए कसरत है बल्कि हमारी श्वास भी है जो अत्यधिक तनाव को मुक्त करने में मदद करता है योग सचमुच हमे दिन की दिनचर्या के लिए तैयार करता है।
  • यदि शरीर व मन स्वस्थ नही हैं।
  • यह योग उसके लिए संभव नहीं है जो बहुत अधिक खाता है , या जो बिलकुल भी नहीं खाता ; जो बहुत अधिक सोता है , या जो हमेशा जगा रहता है। -- भगवद गीता
  • योग 99% अभ्यास और 1% सिद्धांत है। -- श्री कृष्ण पट्टाभि जॉइस
  • योग आपके मन को शांत करने का एक प्राचीन तरीका है।
  • योग आपको स्वीकार करता है और प्रदान करता है।
  • योग एक तरह से लगभग संगीत जैसा है; इसका कोई अंत नहीं है। -- स्टिंग
  • योग एक धर्म नहीं है। यह एक विज्ञान है, सलामती का विज्ञान, यौवन का विज्ञान, शरीर, मन और आत्मा को एकीकृत करने का विज्ञान है। -- अमित राय
  • योग एक लाभदायक प्रक्रिया है, जो न सिर्फ मनुष्य को चुनौतीपूर्ण बीमारियों से छुटकारा दिलवाने में मदद करती है बल्कि उन्हें आजीवन स्वास्थ्य रखने में भी उपयोगी साबित होती है।
  • योग करने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण उपकरण जो आपको चाहिए होंगे वो हैं आपका शरीर और आपका मन। -- रॉडने यी
  • योग का आसन, जाने के लिए एक अच्छी जगह है जब टॉक थेरेपी और एंटीडेप्रेसेन्ट्स पर्याप्त न हों। -- एमी वेंट्रौब
  • योग के पास उन मेन्टल पैटर्न्स को शार्ट सर्किट करने के बड़े शातिर और चालाक तरीके हैं जो चिंता पैदा करते हैं। -- बैक्सटर बेल
  • योग के बारे में यह कभी भी मत सोचिये की योग से क्या मिल सकता है बल्कि यह सोचिये की योग के द्वारा हम क्या नही प्राप्त कर सकते है।
  • योग को दृढ संकल्प और अटलता के साथ बिना किसी मानसिक संदेह या संशय के साथ किया जाना चाहिए। -- भगवद गीता
  • योग न सिर्फ मनुष्य के मस्तिष्क और शरीर की एकता को संगठित करता है बल्कि यह मनुष्य के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का काम करता है। योग से मनुष्य का मन शांत रहता है और उसे अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करने में मदद मिलती है।
  • योग बहुत ही आश्चर्यजनक है इससे हमारे स्वास्थ्य की समस्याएं दूर तो होती हैं तथा साथ में खुद का अवलोकन होता भी होता है।
  • योग भी अब व्यवसाय के रूप में बदल रहा है और कई लोगों को रोजगार भी प्रदान कर रहा है।
  • योग मन के उतार-चढ़ाव को स्थिर करने की प्रक्रिया है।
  • योग मन को शांत करने का अभ्यास है।
  • योग मन को शांति में स्थिर करना है। जब मन स्थिर हो जाता है , हम अपनी आवश्यक प्रकृति में स्थापित हो जाते हैं , जोकि असीम चेतना है। हमारी आवश्यक प्रकृति आम तौर पर मस्तिष्क की गतिविधियों द्वारा ढक दी जाती है। -- पतंजलि
  • योग मन को स्थिर करने की क्रिया है। -- पतंजलि
  • योग मनुष्य को सफल बनाने में भी उसकी मदद करता है। वहीं नियमित रुप से किया गया योग अभ्यास मनुष्य को एक बेहतर शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक स्वास्थ्य की तरफ ले जाता है।
  • योग यौवन का फव्वारा है। आप उतने ही नौजवान हैं जितनी आपके रीढ़ की हड्डी लचीली है। -- बॉब हार्पर
  • योग वह प्रकश है जो एक बार जला दिया जाए तो कभी कम नहीं होता। जितना अच्छा आप अभ्यास करेंगे , लौ उतनी ही उज्जवल होगी। -- बी के एस आयंगर
  • योग विश्राम में उत्साह है। दिनचर्या में स्वतंत्रता। आत्म नियंत्रण के माध्यम से विश्वास। भीतर ऊर्जा और बाहर ऊर्जा । -- यम्बर डेलेक्टो
  • योग सिर्फ आत्म सुधार के बारे में नहीं बतलाता है, बल्कि यह आत्म स्वीकृति के बारे में सिखाता है।
  • योग सिर्फ कसरत ही नहीं है बल्कि यह खुद अपने आप पर काम करता है।
  • योग से सिर्फ रोगों, बीमारियों से छुटकारा ही नही मिलता है बल्कि यह सबके कल्याण की गारंटी भी देता है।
  • योग स्वीकार करता है। योग प्रदान करता है। -- एप्रिल वैली
  • योग हम सभी को नकारात्मकता से दूर रखता है और हमारे मस्तिस्क में अच्छे विचारों का निर्माण करता है। वहीं मनुष्य योग के द्धारा अपनी जीवनशैली में बदलाव कर सकता है और एक सुखी और स्वस्थ जीवन जी सकता है।
  • योग हमारी कमियों पर प्रकाश डालता हैं।
  • योग हमारे जीवन की शक्ति, ध्यान करने की क्षमता और उत्पादकता को बढ़ाता है योग मनुष्य के शरीर, मन और भावना को स्थिर और नियंत्रित भी करता है।
  • योग हमें उन चीजों को ठीक करना सिखाता है जिसे सहा नहीं जा सकता और उन चीजों को सहना सिखाता है जिन्हे ठीक नहीं किया जा सकता। -- बी के एस आयंगर
  • योग हमे खुशी, शांति और पूर्ति की एक स्थायी भावना प्रदान करता है।
  • योग हर उस व्यक्ति के लिए संभव है जो वास्तव में इसे चाहता है। योग सार्वभौमिक है ….लेकिन योग को सांसारिक लाभ हेतु एक व्यवसायिक दृष्टिकोण से ना अपनाएं। -- श्री कृष्ण पट्टाभि जॉइस
  • योग हर वह व्यक्ति के कर सकता है जो वास्तव में इसे चाहता है क्योंकि योग सार्वभौमिक है।
  • योगा हमे वो ऊर्जा प्रदान करता है जो हम हज़ारो घंटे भी अपना काम करके अर्जित नहीं कर सकते। ।
  • रोना उच्चतम भक्ति गीतों में से एक है। जो रोना जानता है, वह साधना जानता है। यदि आप सच्चे दिल से रो सकें, तो इस प्रार्थना के तुल्य कुछ भी नहीं है। रोने में योग के सभी सिद्धांत शामिल हैं। -- कृपालवानंदजी
  • व्यायाम गद्य की तरह है , जबकि योग गति की कविता है। एक बार जब आप योग का व्याकरण समझ जाते हैं ; आप अपने गति की कविता लिख सकते हैं। -- अमित राय
  • शरीर आपका मंदिर है। आत्मा के निवास के लिए इसे पवित्र और स्वच्छ रखिये। -- बी० के० एस० आयंगर
  • शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए योग और ध्यान अपनायें।
  • सभी बीमारियों का उपचार योग और स्वस्थ जीवन शैली में निहित है। -- बाबा रामदेव
  • सभ्यता द्वारा घायल हुए लोगों के लिए, योग सबसे बड़ा मरहम है। -- टी गिलेमेट्स
  • सांसें अंदर लो , और ईश्वर तुम तक पहुँचता है। सांसें रोके रहो , और ईश्वर तुम्हारे साथ रहता है। सांसें बाहर निकालो, और तुम ईश्वर तक पहुँचते हो। सांसें छोड़े रहो , और ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाओ। -- कृष्णामचार्य
  • स्वस्थ जीवन जीना जिंदगी की जमा पूंजी, योग करना रोगमुक्त जीवन की कुंजी…।
  • स्वास्थ सबसे बड़ा उपहार हैं, संतोष सबसे बड़ा धन हैं, यह दोनों योग से ही मिलते हैं।
  • हमारा स्वास्थ्य ही असली धन है न कि सोने और चांदी के टुकड़े, इसलिए योग के द्वारा इसे बनाये रखें।
  • हमारे पास प्राचीनकाल में स्वास्थ्य बीमा नहीं था लेकिन हम सभी के के पास योग एक ऐसा अभ्यास है जो बिना एक पैसे खर्च किये हमारे स्वास्थ्य की रक्षा का आश्वासन देता है।

विभिन्न ग्रन्थों में योग

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अन्य विद्याओं की तरह योग का उद्भव भी वेदों से हुआ है।

  • विज्ञलोग, पुरोहित, यजमान अपने मनों को केन्द्रित करते हैं और प्रार्थनाओं को महान (सविता) में लगाते हैं जो सभी प्रार्थनाओं को जानने वाला है। -- ऋग्वेद
  • यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन।
स धीनां योगमिन्वति॥ -- ऋक्संहिता, मण्डल-1, सूक्त-18, मंत्र-7
योग के बिना विद्वान का भी कोई यज्ञकर्म सिद्ध नहीं होता। वह योग क्या है?
  • स घा नो योग आभुवत् स राये स पुरं ध्याम।
गमद् वाजेभिरा स नः ॥ -- ऋग्वेद 1-5-3
वही परमात्मा हमारी समाधि के निमित्त अभिमुख हो, उसकी दया से समाधि, विवेक, ख्याति तथा ऋतम्भरा प्रज्ञा का हमें लाभ हो, अपितु वही परमात्मा अणिमा आदि सिद्धियों के सहित हमारी ओर आगमन करे।
  • योगे योगे तवस्तरं वाजे वाजे हवामहे।
सखायऽइन्द्रमूतये॥ -- यजुर्वेद 11/14
बार-बार योगाभ्यास करते और बार-बार मानसिक और शारीरिक बल बढ़ाते हुये हम सब परस्पर मित्रभाव से युक्त होकर अपनी रक्षा के लिये अनन्त बलवान्, ऐश्वर्यशाली ईश्वर का ध्यान करते हैं। उसी से सब प्रकार की सहायता मांगते हैं।
  • यु॒ञ्जा॒नः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्याऽध्याभरत्॥ -- यजुर्वेद 11/1
जो पुरुष योगाभ्यास और भूगर्भविद्या सीखना चाहे, वह यम आदि योग के अङ्ग और क्रिया-कौशलों से अपने हृदय को शुद्ध करके तत्त्वों को जान, बुद्धि को प्राप्त और इन को गुण, कर्म तथा स्वभाव से जान के उपयोग लेवे।
  • युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे।
सुवर्गेर्याय शक्त्या॥ -- यजुर्वेद 11/2
मनुष्य परमेश्वर की इस सृष्टि में समाहित हुए योगाभ्यास ओर तत्त्वविद्या को यथाशक्ति सेवन करें तथा उनमें सुन्दर आत्मज्ञान के प्रकाश से युक्त हुए योग और पदार्थविद्या का अभ्यास करें, तो अवश्य सिद्धियों को प्राप्त हो जावें।
  • युक्त्वाय मनसा देवान्सुवर्यतो धिया दिवम् ।
बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान्॥ -- यजुर्वेद 11/3
जो पुरुष योग और पदार्थविद्या का अभ्यास करते हैं, वे अविद्या आदि क्लेशों को हटानेवाले शुद्ध गुणों को प्रकट कर सकते हैं। जो उपदेशक पुरुष से योग और तत्त्वज्ञान को प्राप्त होकर ऐसा अभ्यास करे, वह भी इन गुणों को प्राप्त होवे।
  • युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः।
आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥ -- यजुर्वेद 11/5
अर्थात् योगाभ्यास के ज्ञान को चाहने वाले मनुष्यों को चाहिये कि योग में कुशल विद्वानों का सङ्ग करें। उनके सङ्ग से योग की विधि को जान के ब्रह्मज्ञान का अभ्यास करें।

उपनिषद

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यद्यपि योग विद्या का स्तम्भ पतञ्जलि के योगसूत्र को माना जाता है परन्तु योग विद्या का आधार वेदों में है। वेदों से निकली योग विद्या का वटवृक्ष स्वरूप उपनिषदों में देखने को मिलता है।

  • तां योगमिति मन्यते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । -- कठोपनिषद् २/३/११
जिसमें इन्द्रियाँ (मन व बुद्धि) स्थिर और संयमित हो जातीं हैं, वही योग है।
  • यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।
बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम्॥
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ -- कठोपनिषद 6 / 10-11, नचिकेता और यम के बीच सम्वाद
जब मन के साथ समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भलीभाँति स्थिर हो जाती है तथा बुद्धि की भी कोई चेष्टा नहीं रहती, तब इस अवस्था को परमागति कहते हैं । उसी स्थिर इन्द्रिय-धारणा को योग कहते हैं। उस अवस्था में साधक प्रमाद रहित होता है। क्योंकि 'योग' ही पदार्थों का उद्भव तथा लय (प्रभवाव्ययौ) दोनों ही है।[४]
(जब मन के सहित पांचों ज्ञानेन्द्रियां भली प्रकार स्थित हो जाती हैं और बुद्धि चेष्टा नहीं करती उसे परमगति कहते हैं। उस स्थिर इन्द्रियधारणा को ‘योग’ मानते हैं। क्योंकि तब (वह) प्रमाद रहित हो जाता है (निश्व्चय ही) योग (शुभ के) उदय और (अशुभ के) अस्त वाला है।)
  • ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । -- श्वेताश्वतरोपनिषत [५]
वे योगी ध्यान में गए और उन्होंने ईश्वर की शक्ति को अपने अन्दर देखा।
  • प्राणायामस्तथा ध्यानं प्रत्याहारोऽथ धारणा ।
तर्कश्चैत्र समाधिश्च षडङ्गो योग उच्यते ॥ -- अमृतनादोपनिषद्
योग इन छः अंगों वाला है - प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क तथा समाधि।
  • आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा।
ध्यानं समाधितरेतानि योगङ्गानि भवन्ति षड्॥ -- योगचूडामण्युपनिषद्
आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि - योग के ये छः अंग होते हैं।
  • कर्म कर्तव्यमित्येव विहितेष्वेव कर्मसु ।
बन्धनं मनसो नित्यं कर्मयोगः स उच्यते॥
यत्तुचित्तस्य सततमर्थे श्रेयसि बन्धनम्।
ज्ञानयोगः स विज्ञेयः सर्वसिद्धिकरः शिवः॥ -- त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्
विहित कर्मों में इस बुद्धि का बने रहना, यह कर्तव्य कर्म है। शास्त्रानुकूल कर्मों में निरन्तर मन लगाये रखना कर्मयोग कहलाता है।
श्रेय के अर्थ में चित्त का सदैव बद्ध रहना ज्ञान योग कहलाता है। यह ज्ञान योग सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाला और कल्याणकारी है।
( ध्यातव्य है कि त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् में अष्टांग योग के साथ-साथ कर्मयोग व ज्ञानयोग का भी वर्णन मिलता है।)
  • मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते ॥ -- महोपनिषद, ५-४२
मन की पूर्णतया शान्ति के साधन को योग कहा गया है।
  • प्रत्याहारस्तथा ध्यानं प्राणायामोथ धारणा ।
तर्कश्चैव समाधिश्च षडङ्गो योग उच्चते ॥ -- अमृतनादोपनिषद् तथा मैत्रायणी उपनिषद
प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क और समाधि के रूप में योग छः अंगों वाला (षडङ्ग) है।
  • आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा ।
ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट् ॥ -- ध्यानविन्दूपनिषद्
आसन, प्राणसंरोध, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि - ये योग के छः अंग हैं।
  • हेतुद्वयं हि चित्तस्य वासना च समीरणः ।
तयोर्विनष्टे एकस्मिंस्तद्वावपि विनश्यतः ॥ -- योग कुण्डल्युपनिषद्
चित्त के दो हेतु है- वासना और प्राण। इनसे से किसी एक पर नियंत्रण होने से दोनो नियंत्रित हो जाते हैं ।
  • योगहीनं कथं ज्ञानं मोक्षदं भवति ध्रुवम्।
योगोऽपि ज्ञानहीनस्तु न क्षमो मोक्षकर्मणि ॥ -- योगतत्त्वोपनिषद्
योग के बिना ज्ञान कैसे निश्चित रूप से मोक्षदायी हो सकता है ? उसी प्रकार ज्ञानहीन योग भी मोक्षकर्म में असमर्थ है।
  • मंत्रयोगो लयश्चैव हठोऽसौ राजयोगकः । --योगतत्त्वोपनिषद्
मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग - ये योग के चार विभाग हैं।
  • न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः।
प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥ -- श्वेताश्वतर उपनिषद्
योगाग्निमय शरीर जिसको प्राप्त होता है, उसे कोई रोग नहीं होता, बुढ़ापा नहीं आता और मृत्यु भी नहीं होती ।

रामायण

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  • संसारोत्तरेण युक्तिर्योग शब्देन कथ्यते । -- योगवशिष्ठ महारामायण
इस संसार सागर से पार होने की युक्ति ही योग है।
  • मार्गस्त्रयो मया प्रोक्ताः पुरा मोक्षाप्तिसाधनाः ।
कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्वतः ॥ -- अध्यात्म रामायण
पहले मैंने मोक्षप्राप्ति के तीन साधन बतलाये हैं- कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग।

महाभारत

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  • सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ भीष्म. २६/४८, गीता.२/४८॥
  • योगः कर्मसु कौशलम्॥ भीष्म. २६/५०, गीता.२/५०॥
  • एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥ भीष्म. २९/५, गीता.५/५॥
  • इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः॥ भीष्म. २९/१९, गीता.५/१९॥
  • तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ भीष्म. ३३/२२, गीता.९/२२॥
  • तं पूर्वापररात्रेषु युञ्जानः सततं बुधः।
लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यामानमात्मनि॥ शान्ति. १८७/२९॥
  • तस्मात् समाहितं बुद्ध्या मनो भूतेषु धारयेत्।
नापध्यायेन्न स्पृहयेन्नाबद्धं चिन्तयेदसत्॥ शान्ति. २१५/८॥
  • अथामोघप्रयत्नेन मनो ज्ञाने निवेशयेत्।
वाचामोघप्रयासेन मनोज्ञं तत् प्रवर्तते॥ शान्ति. २१५/९॥
  • धृतिमानात्मवान् बुद्धिं निगृह्णीयादसंशयम्।
मनो बुद्ध्या निगृह्नीयाद् विषयान्मनसाऽऽत्मनः॥ शान्ति. २१५/१८॥
  • आहारनियमं चैव देशे काले च सात्त्विकम्।
तत् परीक्ष्यानुवर्तेत तत्प्रवृत्त्यनुपूर्वकम्॥ शान्ति. २१५/२३॥
  • प्रवृत्तं नोपरुन्धेत शनैरग्निमिवेन्धयेत्।
ज्ञानान्वितं तथा ज्ञानमर्कवत् सम्प्रकाशते॥ शान्ति. २१५/२४॥
  • हेतुमच्छक्यमाख्यातुमेतावज्ज्ञान चक्षुषा।
प्रत्याहारेण वा शक्यमक्षरं ब्रह्म वेदितुम्॥ शान्ति. २१६/२०॥
  • यच्छेद् वाङ्मनसी बुद्ध्या य इच्छेज्ज्ञानमुत्तमम्॥ शान्ति. २३६/४॥
  • ज्ञानेन यच्छेदात्मानं य इच्छेच्छान्तिमात्मनः॥ शान्ति. २३६/५॥
  • निर्मुच्यमानः सूक्ष्मत्वाद् रूपाणीमानि पश्यतः।
शैशिरस्तु यथा धूमः सूक्ष्मः संश्रयते नभः॥ शान्ति. २३६/१७॥
  • एकत्वं बुद्धिमनसोरिन्द्रियाणां च सर्वशः॥ शान्ति. २४०/२॥
  • आत्मनो व्यापिनस्तात ज्ञानमेतद्नुत्तमम्।
तदेतदुपशान्तेन दान्तेनाध्ययनशीलिना॥ शान्ति. २४०/३॥
  • आत्मारामेण बुद्धेन बोद्धव्यं शुचिकर्मणा।
योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः॥ शान्ति. २४०/४॥
  • कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्पप्नं च पञ्चमम्।
क्रोधं शमेन जयति कामं संकल्पवर्जनात्॥ शान्ति. २४०/५॥
  • सत्त्वसंसेवनाद् धीरो निद्रामुच्छेतुमर्हति।
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा॥ शान्ति. २४०/६॥
  • चक्षुः श्रोत्रे च मनसा मनोवाचं च कर्मणा।
अप्रमादाद् भयं जह्याद् दम्भं प्राज्ञोपसेवनात्॥ शान्ति. २४०/७॥
  • वर्जयेदुशतीं वाचं हिंसायुक्तां मनोनुदाम्॥ शान्ति. २४०/९॥
  • ध्यानमध्ययनं दानं सत्यं ह्रीरार्जवं क्षमा॥ शान्ति. २४०/१०॥
  • शौचमाचारसंशुद्धिरिन्द्रियाणां च निग्रहः।
एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानं चापकर्षति॥ शान्ति. २४०/११॥
  • धूतपाम्पा तु तेजस्वी लघ्वाहरो जितेन्द्रियः।
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद् ब्रह्मणः पदम्॥ शान्ति. २४०/१३॥
  • मनसश्चेन्द्रियाणां च कृत्वैकाग्य्रं समाहितः।
पूर्वरात्रापरार्धं च धारयेन्मन आत्मनि॥ शान्ति. २४०/१४॥
  • जन्तोः पञ्चेन्द्रियस्यास्य यदेकं छिद्रमिन्द्रियम्।
ततोऽस्य स्रवते प्रज्ञा दृतेः पादादिवोदकम्॥ शान्ति. २४०/१५॥
  • मनस्तु पूर्वमादद्यात् कुमीनमिव मत्स्यहा।
ततः श्रोत्रं ततश्चक्षुर्जिह्वां घ्राणं च योगवित्॥ शान्ति. २४०/१६॥
  • तत एतानि संयम्य मनसि स्थापयेद् यतिः।
तथैवापोह्य संकल्पान्मनो ह्यात्मनि धारयेत्॥ शान्ति. २४०/१७॥
  • विधूम इव दीप्तार्चिरादित्य इव दीप्तिमान्॥ शान्ति. २४०/१९॥
  • वैद्युतोऽग्निरिवाकाशे दृश्यतेऽऽत्मा तथाऽऽत्मनि।
प्रमोहो भ्रम आवर्तो घ्राणं श्रवणदर्शने।
अद्भुतानि रसस्पर्शे शीतोष्णे मारुताकृतिः॥ शान्ति. २४०/२३॥
  • प्रतिभामुपसर्गांश्चाप्युपसंगृह्य योगतः।
तांस्तत्वविदनादृत्य आत्मन्येव निवर्तयेत्॥ शान्ति. २४०/२४॥
  • येनोपायेन शक्येत संनियन्तुं चलं मनः।
तं च युक्तो निषेवेत न चैव विचलेत् ततः॥ शान्ति. २४०/२७॥
  • नाभिष्वजेत् परं वाचा कर्मणा मनसापि वा।
उपेक्षको यताहारो लब्धालब्धे समो भवेत्॥ शान्ति. २४०/२९॥
  • अपि वर्णावकृष्टस्तु नारी वा धर्मकाङ्क्षिणि।
तावप्येतेन मार्गेण गच्छेतां परमां गतिम्॥ शान्ति. २४०/३४॥
  • निरापद्धर्म आचारो ह्यप्रमादोऽपराभवः॥ शान्ति. २६९/३६॥
  • प्रत्यक्षमिह पश्यन्ति भवन्तः सत्पथे स्थिताः॥ शान्ति. २६९/४०॥
  • यथा समुद्रमभितः संश्रिताः सरितोऽपराः।
तथाद्या प्रकृतिर्योगादभिसंश्रियते सदा॥ शान्ति. २९८/३४॥
  • रागं मोहं तथा स्नेहं कामं क्रोधं च केवलम्।
योगाच्छित्त्वा ततो दोषान् पञ्चैतान् प्राप्नुवन्ति तत्॥ शान्ति. ३००/११॥
  • अप्रमत्तो यथा धन्वी लक्ष्यं हन्ति समाहितः।
युक्तः सम्यक् तथा योगी मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम्॥ शान्ति. ३००/३१॥
  • सुस्थेयं क्षुरधारासु निशितासु महीपते।
धारणासु तु योगस्य दुःस्थेयमकृतात्मभिः॥ शान्ति. ३००/५४॥
  • कामक्रोधौ भयं निद्रा पञ्चमः श्वास उच्यते।
एते दोषाः शरीरेषु दृश्यन्ते सर्वदेहिनाम्॥ शान्ति. ३०१/५५॥
  • छिन्दन्ति क्षमया क्रोधं कामं संकल्पवर्जनात्।
सत्त्वसंसेवनान्निद्रामप्रमादाद् भयं तथा॥ शान्ति. ३०१/५६॥
  • छिन्दति पञ्चमं श्वासमल्पहारतया नृप॥ शान्ति. ३०१/५७॥
  • इन्द्रियैः सह सुप्तस्य देहिनः शत्रुतापन।
सूक्ष्मश्चरति सर्वत्र नभसीव समीरणः॥ शान्ति. ३०१/८८॥
  • ज्योतिरात्मनि नान्यत्र सर्वजन्तुषु तत् समम्।
स्वयं च शक्यते द्रष्टुं सुसमाहितचेतसा॥ शान्ति. ३२६/३२॥
  • संयोज्य मनसा ऽऽत्मानमीर्ष्यामुत्सृज्य मोहनीम्।
त्यक्त्वा कामं च मोहं च तदा ब्रह्मत्वमश्नुते॥ शान्ति. ३२६/३५॥
  • यदा श्राव्ये च दृश्ये च सर्वभूतेषु चाप्ययम्।
समो भवति निर्द्वन्द्वो ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ शान्ति. ३२६/३६॥
  • प्रसार्येह यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः।
तथेन्द्रियाणि मनसा संयन्तव्यानि भिक्षुणा॥ शान्ति. ३२६/३९॥
  • तमः परिगतं वेश्च यथा दीपेन दृश्यते।
तथा बुद्धिप्रदीपेन शक्य आत्मा निरीक्षितुम्॥ शान्ति. ३२६/४०॥
  • न चायुक्तेन शक्योऽयं द्रष्टुं देहे महेश्वरः।
युक्तस्तु पश्यते बुद्ध्या संनिवेश्य मनो हृदि॥ अनु. ९६ दा. पा.॥
  • इन्द्रियाणि तु संहृत्य मन आत्मनि धारयेत्।
तीव्रं तप्त्वा तपः पूर्वं मोक्षयोगं समाचरेत्॥ आश्व. १९/१७॥
  • यथा हि पुरुषः स्वप्ने दृष्ट्वा पश्यत्यसाविति।
तथा रूपमिवात्मानं साधु युक्तः प्रपश्यति॥ आश्व. १९/२१॥
  • इषीकां च यथा मुञ्जात् कश्चिन्निष्कृष्य दर्शयेत्।
योगी निष्कृष्य चात्मानं तथा पश्यति देहतः॥ आश्व. १९/२२॥
  • अन्यान्याश्चैव तनवो यथेष्टं प्रतिपद्यते।
विनिवृत्य जरां मृत्युं न शोचति न हृष्यति॥ आश्व. १९/२५॥
  • दुःखशोकमयैर्घोरैः सङ्गस्नेह समुद्भवैः।
न विचाल्यति युक्तात्मा निःस्पृहः शान्तमानसः॥ आश्व. १९/२८॥
  • सम्यग्युक्त्वा स आत्मानमात्मन्येव प्रतिष्ठते।
विनिवृत्तजरादुःखः सुखं स्वपिति चापि सः॥ आश्व. १९/३०॥
  • सम्युग्युक्तो यदाऽऽत्मानमात्मन्येव प्रपश्यति।
तदैव न स्पृहयते साक्षादपि शतक्रतोः॥ आश्व. १९/३२॥
  • समानव्यानयो र्मध्ये प्राणापानौ विचेरतुः॥ आश्व. २०/१५॥
  • तस्मिंल्लीने प्रलीयेत समानो व्यान एव च।
अपान प्राणयोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति।
तस्माच्छयानं पुरुषं प्राणापानौ च मुञ्चतः॥ आश्व. २०/१६॥
  • तेषामन्योन्यभक्षाणां सर्वेषां देहचारिणाम्।
अग्निर्वैश्वानरो मध्ये सप्तधा दीव्यतेऽन्तरा॥ आश्व. २०/१७॥
  • घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् च श्रोत्रं च पञ्चमम्।
मनो बुद्धिश्च सप्तैता जिह्वा वैश्वानरार्चिषः॥ आश्व. २०/१९॥
  • घ्रेयं दृश्यं च पेयं च स्पृश्यं श्रव्यं तथैव च।
मन्तव्यमथ बोद्धव्यं ताः सप्त समिधो मम॥ आश्व. २०/२०॥
  • योगान्नास्ति परं सुखम्॥ आश्व. ३०/३१॥
  • यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतयः सदा।
सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमाः॥ आश्व. ५१/२३॥
  • चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संयतः।
यच्चित्तं तन्मयो वश्यं गुह्यमेतत् सनातनम्॥ आश्व. ५१/२७॥

पुराणों में अनेक लोकोपयोगी विद्याओं का वर्णन उपलब्ध होता है, जैसे- अश्वशास्त्र का ज्ञान, रत्नपरीक्षा का ज्ञान, वास्तुविद्या का ज्ञान, धनुर्विद्या का ज्ञान आदि। इसी प्रकार पुराणों में योगविद्या का भी वर्णन विस्तार से मिलता है। पुराणों में भी पातञ्जल योगसूत्र के अनुसार योग का लक्षण दिया गया है, परन्तु पुराणकारों ने चित्त का अर्थ इन्द्रियाँ लिया है।

  • आत्मप्रयत्नसापेक्षा विशिष्टा या मनोगतिः।।
तस्या ब्रह्मर्षि संयोगो योग इत्याभिधीयते॥ -- विष्णुपुराण, 6.7.31
आत्माज्ञन के प्रयत्नभूत यम, नियमादि की अपेक्षा रखनेवाली मन की विशिष्ट गति है, उसका ब्रह्म के साथ संयोग होना ही योग है।
  • आहुः शरीरं रथामिन्द्रियाणि हयानभीषून् मनइन्द्रियेशम्।
वर्मनि मत्राधिष्णां च सूतं सत्वं वृहद् | बन्धुरमीशसृष्टम्॥ -- भागवतपुराण, 7.15.41
बहिर्गामी उच्छृखल इन्द्रियों को सांसारिक विषयों से हटाकर इनकी प्रवृत्ति को अन्तर्मुखी करना योग है।
  • ब्रह्मप्रकाशकं ज्ञानं योगस्तत्रेकचित्तता।
चित्तवृत्तिनिरोधश्च जीवब्रह्मात्मनोः परः॥ -- अग्निपुराण, 372.1-2
चित्त की एकाग्रता ही योग है और चित्तवृत्ति का निरोध ही योग है जो जीवात्मा और परमात्मा से परे रहा करता है।
  • ज्ञान के द्वारा वैराग्य की उत्पत्ति होती है तथा वैराग्य के द्वारा दुःखों का नाश। -- मार्कण्डेयपुराण

रामचरितमानस

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  • जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।
बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ॥117 क॥
तब योग रूपी अग्नि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्म रूपी ईंधन लगा दें (सब कर्मों को योग रूपी अग्नि में भस्म कर दें)। जब (वैराग्य रूपी मक्खन का) ममता रूपी मल, जल जाए, तब (बचे हुए) ज्ञान रूपी घी को (निश्चयात्मिका) बुद्धि से ठंडा करें।
  • यस्मिन्देशे वसेद्योगी ध्यायी योगविचक्षणः ।
सोऽपि देशो भवेत्पूतः किं पनस्तस्य बान्धवाः ॥ -- याज्ञवल्क्यस्मृति
  • इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् ।
अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥ -- याज्ञवल्क्यस्मृति १.८
यज्ञाचार, दम, अहिंसा, दान और स्वाध्याय, प्रभृति कर्मों में योग के द्वारा आत्मदर्शन ही परम धर्म है ।
  • मंत्रो लयो हठो राजयोगन्तर्भूमिका क्रमात् ।
एक एव चतुर्धाऽयं महायोगोभियते ॥ -- गोरक्षशतकम्
महायोग एक ही है (किन्तु) यह चार प्रकार का होता है- मंत्रयोग , हठयोग लययोग व राजयोग।
  • श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवेहि । -- कैवल्य उपनिषद्
अर्थात् श्रद्धा भक्ति, ध्यान के द्वारा आत्मा का ज्ञान ही योग हैं।
  • मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते। -- महोपनिषद ५-४२
मन के प्रशमन के उपाय को योग कहते हैं।
  • पुंप्रकृत्योर्वियोगेऽपि योग इत्यभिधीयते । -- सांख्य दर्शन
अथाषि् पुरुष-प्रकृति का वियोग ही योग है।
  • चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाना या उसका पूर्णतया समाप्त हो जाना ही योग है। -- लिंग पुराण
  • केवलं राजयोगाय हठविद्योपदिश्यते। -- हठयोगप्रदीपिका
मैं इस हठविद्या का उपदेश केवल राजयोग की प्राप्ति के लिए कर रहा हूँ।
(हठयोग प्रदीपिका में योग को समाधि कहा गया है यह समाधि जीवात्मा एवं परमात्मा की एकता से व सभी संकल्पों के नष्ट होने पर प्राप्त होती है अर्थात् जीवात्मा परमात्मा के मिलन से साधक के सभी संकल्प नष्ट हो जाते हैं और यही अवस्था समाधि या योग की अवस्था है।)
  • शोधनं दृढ़ता चैव स्थैर्यं धैर्यं च लाघवम् ।
प्रत्यक्षं च निर्लिप्तं च घटस्थं सप्तसाधनम्। -- घेरण्डसंहिता
शरीर की शुद्धि के लिए सात साधन है- शोधन, दृढ़ता, स्थैर्य, धैर्य, लाघव, प्रत्यक्ष, और निर्लिप्तता । (जिन्हें सामान्यतः 'सप्तसाधन' की संज्ञा दी जाती है।)
  • षट्कर्मणा शोधनं च आसनेन भवेद् दृढम् ।
मुद्रया स्थिरता चैव प्रत्याहारेण धीरता ॥
प्राणायामाल्लाघवं च ध्यानात्प्रत्यक्षमात्मनि ।
समाधिना च निर्लिप्तं मुक्तिरेव न संशयः ॥ -- घेरण्डसंहिता
अर्थात् शरीर के शोधन के लिए षट्कर्म, दृढ़ता के लिये आसनों का अभ्यास, स्थैर्य के लिये मुद्रायें, धैर्य के लिये प्रत्याहार, लाघव के लिये प्राणायाम, ध्येय के प्रत्यक्ष दर्शनार्थ ध्यान और निर्लिप्तता (आसक्तिहीनता) के लिये समाधि आवश्यक है। इस क्रम से अभ्यास करने पर अवश्य ही मुक्ति होती है, इसमें संशय नहीं है।
  • धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिनलिकंत्राटकस्तथा ।
कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत् ॥ -- घेरण्डसंहिता, 1/12
अर्थात् योग के लिये धौति, वस्ति, नेति, नौलि, त्राटक और कपालभाति इन षट्कर्मों का अभ्यास करना चाहिए ।
  • आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम् । -- गोरक्ष संहिता, द्वितीयशतक
अर्थात् आसनों से शारीरिक और मानसिक रोग तथा प्राणायाम से पाप नष्ट होते हैं।
  • महामुद्रां नभोमुद्रां उड्डियानं जालन्धरम् ।
मूलबन्धं चयो वेत्ति स योगी मुक्तिभाजनः ॥ -- गोरक्ष संहिता
महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डियानबन्ध, जालन्धरबन्ध और मूलबन्ध के अभ्यास में जो योगी कुशल होता है, वह मुक्ति का पात्र होता है।
  • प्राणायाम इति प्राणस्य स्थिरता। -- सिद्ध-सिद्धान्त-पद्धति
अर्थात् प्राणायाम से प्राण स्थिर होता है।
  • परमात्मा की शाश्वत और अखण्ड ज्योति के साथ अपनी ज्योति को मिला देना ही योग है। -- श्री राम कृष्ण परमहंस
  • जीवन के सिद्धांतों को व्यवहार में लाने की जो कला या युक्ति है, वही योग है। -- महर्षि अरविन्द
  • योग का तात्पर्य एक भाव का अनुभव अथवा अन्तर्निहित आत्म से तादात्म्य स्थापित करना है, यही एकता वास्तविकता से मन तथा पदार्थ के द्वैवादिता को समाहित करके प्राप्त होती है। -- स्वामी सत्यानन्द सरस्वती

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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