• अवश्याय-निपातेन किद्बिचत्प्रक्लिन्नशाद्वला।
वनानां शोभते भूमिर्निविष्टतरूणातपा॥
स्पृशंस्तु विपुलं शीतमुदकं द्विरद: सुखम्।
अत्यन्ततृषितो वन्य: प्रतिसंहरते करम्ड्ड
अवश्याय-तमोनद्धा नीहार-तमसावृता:।
प्रसुप्ता इव लक्ष्यंते विपुष्पा वनराजय:॥
वाष्पसन्छन्नसलिला रुतविज्ञेयसारसा:।
हिमार्द्रबालुकैस्तीरै: सरितो भांति सांप्रतम्ड्ड
जरा-जर्जरितै: पद्मै: शीर्णकेशरकर्णिका:।
नालशेषैर्हिमधवस्तैर्न भांति कमलाकरा:॥ -- वाल्मीकि, का हेमन्त वर्णन
अर्थ : वन की भूमि जिसकी हरी-हरी घास ओस गिरने से कुछ-कुछ गीली हो गई है, तरुण धूप के पड़ने से कैसी शोभा दे रही है। अत्यंत प्यासा जंगली हाथी बहुत शीतल जल के स्पर्श से अपनी सूँड़ सिकोड़ लेता है। बिना फूल के वन-समूह कुहरे के अंधाकार में सोए से जान पड़ते हैं। नदियाँ, जिनका जल कुहरे से ढँका हुआ है और जिनमें सारस पक्षियों का पता केवल उनके शब्द से लगता है, हिम से आर्द्र बालू के तटों से ही पहचानी जाती हैं। कमल, जिनके पत्ते जीर्ण होकर झड़ गए हैं, जिनकी केसर-कणिकाएँ टूट-फूटकर छितरा गई हैं, पाले से धवस्त होकर नालमात्र खड़े हैं।
  • अरुणजलजराजीमुग्धहस्ताग्रपादा बहुल मधुपमालाकज्जलेन्दी वरोक्षी।
अनुपतित विरावैः पत्रिणां व्याहरन्ती रजनिमचिरजाता पूर्वसन्धा सुतेव॥ -- माघ, शिशुपालवधम् , ग्यारहवाँ सर्ग (प्रातः काल का वर्णन)
अर्थात् रात्रि की विदाई पर ऊषा उसका अनुगमन करती हुई ऐसी शोभायमान हो रही है जैसे वह रजनी की सद्यः प्रसूता कन्या हो। यहाँ रक्तकमलों की पंक्तियों की तुलना ऊषारूपी नायिका की हथेली से और पंखुड़ियों की तुलना उसकी अंगुली से की गयी है।
रामचरितमानस (किष्किन्धा काण्ड) में वर्षा ऋतु का वर्णन
  • सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा॥
कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए॥ -- रामचरितमानस
भावार्थ:-सुंदर वन फूला हुआ अत्यंत सुशोभित है। मधु के लोभ से भौंरों के समूह गुंजार कर रहे हैं। जब से प्रभु आए, तब से वन में सुंदर कन्द, मूल, फल और पत्तों की बहुतायत हो गई॥1॥
  • देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा॥
मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा॥ -- रामचरितमानस
भावार्थ:-मनोहर और अनुपम पर्वत को देखकर देवताओं के सम्राट् श्री रामजी छोटे भाई सहित वहाँ रह गए। देवता, सिद्ध और मुनि भौंरों, पक्षियों और पशुओं के शरीर धारण करके प्रभु की सेवा करने लगे॥2॥
  • घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥
दामिनि दमक रह नघन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥
भावार्थ:-आकाश में बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीताजी) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती॥
  • बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।
बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे। खल के बचन संत सह जैसें॥
भावार्थ:-बादल पृथ्वी के समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान् नम्र हो जाते हैं। बूँदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं॥
  • छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥
भावार्थ:-छोटी नदियाँ भरकर (किनारों को) तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं। (मर्यादा का त्याग कर देते हैं)। पृथ्वी पर पड़ते ही पानी गंदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीव के माया लिपट गई हो॥
  • समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥
सरिता जल जलनिधि महुँ जोई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥
भावार्थ:-जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण (एक-एककर) सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्री हरि को पाकर अचल (आवागमन से मुक्त) हो जाता है॥
  • हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥
भावार्थ:-पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गई है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखंड मत के प्रचार से सद्ग्रंथ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं॥
  • दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥
नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥
भावार्थ:-चारों दिशाओं में मेंढकों की ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षों में नए पत्ते आ गए हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गए हैं जैसे साधक का मन विवेक (ज्ञान) प्राप्त होने पर हो जाता है॥
  • अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी॥
भावार्थ:-मदार और जवासा बिना पत्ते के हो गए (उनके पत्ते झड़ गए)। जैसे श्रेष्ठ राज्य में दुष्टों का उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं चलती)। धूल कहीं खोजने पर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है। (अर्थात् क्रोध का आवेश होने पर धर्म का ज्ञान नहीं रह जाता)॥
  • ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी॥
निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥
भावार्थ:-अन्न से युक्त (लहराती हुई खेती से हरी-भरी) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुष की संपत्ति। रात के घने अंधकार में जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दम्भियों का समाज आ जुटा हो॥
  • महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥
कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना॥
भावार्थ:-भारी वर्षा से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतंत्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं (उनमें से घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं।) जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं॥
  • देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं॥
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा॥
भावार्थ:-चक्रवाक पक्षी दिखाई नहीं दे रहे हैं, जैसे कलियुग को पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसर में वर्षा होती है, पर वहाँ घास तक नहीं उगती। जैसे हरिभक्त के हृदय में काम नहीं उत्पन्न होता॥
  • बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा॥
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना॥
भावार्थ:-पृथ्वी अनेक तरह के जीवों से भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजा की वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होने पर इंद्रियाँ (शिथिल होकर विषयों की ओर जाना छोड़ देती हैं)॥
  • कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥
भावार्थ:-कभी-कभी वायु बड़े जोर से चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्र के उत्पन्न होने से कुल के उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं॥
  • कबहु दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥
भावार्थ:-कभी (बादलों के कारण) दिन में घोर अंधकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है॥
रामचरितमानस में शरद ऋतु का वर्णन
  • बरषा बिगत सरद रितु आई। लछमन देखहु परम सुहाई॥
फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥
भावार्थ:-हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद् ऋतु आ गई। फूले हुए कास से सारी पृथ्वी छा गई। मानो वर्षा ऋतु ने (कास रूपी सफेद बालों के रूप में) अपना बुढ़ापा प्रकट किया है॥
  • उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहिं सोषइ संतोषा॥
सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा॥
भावार्थ:-अगस्त्य के तारे ने उदय होकर मार्ग के जल को सोख लिया, जैसे संतोष लोभ को सोख लेता है। नदियों और तालाबों का निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोह से रहित संतों का हृदय!॥
  • रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥
जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥
भावार्थ:-नदी और तालाबों का जल धीरे-धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी (विवेकी) पुरुष ममता का त्याग करते हैं। शरद ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गए। जैसे समय पाकर सुंदर सुकृत आ सकते हैं। (पुण्य प्रकट हो जाते हैं)॥
  • पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी॥
जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना॥
भावार्थ:-न कीचड़ है न धूल? इससे धरती (निर्मल होकर) ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजा की करनी! जल के कम हो जाने से मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख (विवेक शून्य) कुटुम्बी (गृहस्थ) धन के बिना व्याकुल होता है॥
  • बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा॥
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक भाव भगति जिमि मोरी॥
भावार्थ:-बिना बादलों का निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओं को छोड़कर सुशोभित होते हैं। कहीं-कहीं (विरले ही स्थानों में) शरद् ऋतु की थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है। जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं॥
  • चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।
जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि॥
भावार्थ:-(शरद् ऋतु पाकर) राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी (क्रमशः विजय, तप, व्यापार और भिक्षा के लिए) हर्षित होकर नगर छोड़कर चले। जैसे श्री हरि की भक्ति पाकर चारों आश्रम वाले (नाना प्रकार के साधन रूपी) श्रमों को त्याग देते हैं॥
  • सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकऊ बाधा॥
फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा॥
भावार्थ:-जो मछलियाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्री हरि के शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलों के फूलने से तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है॥
  • गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा॥
चक्रबाक मन दुख निसि पेखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी॥
भावार्थ:-भौंरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं तथा पक्षियों के नाना प्रकार के सुंदर शब्द हो रहे हैं। रात्रि देखकर चकवे के मन में वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरे की संपत्ति देखकर दुष्ट को होता है॥2॥
  • चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकर द्रोही॥
सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई॥
भावार्थ:-पपीहा रट लगाए है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्री शंकरजी का द्रोही सुख नहीं पाता (सुख के लिए झीखता रहता है) शरद् ऋतु के ताप को रात के समय चंद्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं॥
  • देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई॥
मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा॥
भावार्थ:-चकोरों के समुदाय चंद्रमा को देखकर इस प्रकार टकटकी लगाए हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान् को पाकर उनके (निर्निमेष नेत्रों से) दर्शन करते हैं। मच्छर और डाँस जाड़े के डर से इस प्रकार नष्ट हो गए जैसे ब्राह्मण के साथ वैर करने से कुल का नाश हो जाता है॥
  • भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।
सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥
भावार्थ:-(वर्षा ऋतु के कारण) पृथ्वी पर जो जीव भर गए थे, वे शरद् ऋतु को पाकर वैसे ही नष्ट हो गए जैसे सद्गुरु के मिल जाने पर संदेह और भ्रम के समूह नष्ट हो जाते हैं॥
रामचरितमानस में वसन्त ऋतु का वर्णन
  • रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी॥
स्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा॥
भावार्थ : वसन्त ऋतु है। शीतल, मंद, सुगंध तीन प्रकार की हवा बह रही है। सभी को (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) चारों पदार्थ सुलभ हैं। माला, चंदन, स्त्री आदि भोगों को देखकर सब लोग हर्ष और विषाद के वश हो रहे हैं। (हर्ष तो भोग सामग्रियों को और मुनि के तप प्रभाव को देखकर होता है और विषाद इस बात से होता है कि श्री राम के वियोग में नियम-व्रत से रहने वाले हम लोग भोग-विलास में क्यों आ फँसे, कहीं इनमें आसक्त होकर हमारा मन नियम-व्रतों को न त्याग दे)॥


  • देखत बन सर सैल सुहाए । वाल्मीकि आश्रम प्रभु आये ॥
राम दीख मुनि वासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन॥
सरनि सरोज बिपट बन फूले । गुंजत मंजु मधुप रस भूले॥
खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं॥
सूचि सुंदर आश्रम निरखि हरसे राजीव नयन।
सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगे आयउ लेन॥ -- रामचरितमानस
  • माघ मकरगति रवि जब होई, तीरथपतिहिं आव सब कोई।   
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सदर मज्जहिं सकल त्रिवेणी॥
भरद्वाज आश्रम अति पावन, परम रम्य मुनिवर मन भावन॥
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा, जाहिं जे मज्जन तीरथ राजा॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥
ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।
ककहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥
प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥ -- रामचरितमानस
  • अगर कोई तरीका दूसरे तरीके से बेहतर है तो आप निश्चित रूप से कह सकते हैं कि वो प्रकृति का तरीका है। -- अरस्तु
  • अनुकूल बनें या नष्ट हो जाएं, अब या कभी भी, यही प्रकृति कि निष्ठुर अनिवार्यता है। -- एच. जी. वेल्स
  • अपना चेहरा सूरज की तरफ रखिए, आपको कोई परछाईं नहीं दिखेगी! -- हेलेन केलर
  • अपनी जड़ों की गहराइयों में सभी फूल प्रकाश रखते हैं। -- थीओडोर रोएथ्के
  • अपनी पहली सांस लेने के पहले के नौ महीने छोड़ दिया जाए तो इंसान अपने काम इतने अच्छे ढंग से नहीं करता जितना कि एक पेड़ करता है। -- जार्ज बर्नार्ड शा
  • आशा ही एक ऐसी मधुमक्खी है जो बिना फूलों के शहद बनाती है। -- राबर्ट ग्रीन इन्गेर्सोल
  • ऐसे ग्रहों के लोग जाहाँ फूल ना हों, यही सोचेंगे की हम हर समय ख़ुशी से पागल रहते होंगे कि हमारे पास ऐसी चीजें हैं। -- आइरिस मर्डोक
  • और वो दिन आ गया जब कली के अन्दर बंद रहने का जोखिम खिलने के जोखिम से अधिक दर्दनाक था। -- एनेस निन
  • कुछ लोग बरसात में चहलकदमी करते हैं, और बाकी बस भीगते हैं। -- रोजर मिलर
  • कुदरत को पढ़िए, कुदरत से प्रेम कीजिए उसके करीब रहिए। आप कभी निराश नहीं होंगे। -- फ्रैंक ल्योड राइट
  • केटरपिलर जिसे दुनिया का अंत कहता है, मास्टर उसे तितली कहते हैं। -- रिचर्ड बैक
  • केवल जी लेना काफी नहीं है… इंसान को धूप, आजादी और एक नन्हा सा फूल भी चाहिए। -- हैंस क्रिस्टियन एंडरसन (डेनमार्क के लेखक)
  • चिड़िया तूफान के बाद भी गाती है, जो बच गया उसका मनुष्य भी क्यों नहीं जश्न मनाता है? -- रोज़ केनेडी (अमेरिकी समाजवादी)
  • चीजों के प्रकाश में सामने आओ, प्रकृति को को अपना शिक्षक बनने दो। -- विल्लियम वर्डस्वर्थ
  • जब प्रकृति को कोई काम कराना होता है तो वो किसी प्रतिभा को जन्म दे देती है। -- राल्फ वाल्डो एमर्सन
  • जहां भी आप जाएं, मौसम चाहे कोई भी हो अपना सूरज और अपनी धूप साथ रखें। -- एंथनी जे. डी’एंजेलो
  • जो बागीचे में बदसूरत लगेगा वो पहाड़ों पर खूबसूरती बढाता है। -- विक्टर ह्यूगो
  • दरअसल बसंत प्रकृति के यह कहने का अपना तरीका है कि ‘चलो जश्न मनाएं’! -- रॉबिन विलियम्स (अमेरिकी हास्य अभिनेता)
  • धरती माता इस साल भले माफ़ कर दें या अगले साल भी, पर अंततः में वो आएँगी और आपको सजा देंगी। आपको तैयार रहना होगा। -- गेरालडो रिवेरा
  • धरती माता की हंसी फूल बनकर खिलती है। -- राल्फ वाल्डो एमर्सन
  • पक्षी तूफ़ान गुजरने के बाद भी गाना गाते हैं; क्यों नहीं लोग भी जो कुछ बचा है उसी में प्रसन्न रहने के लिए खुद को स्वतंत्र महसूस करते हैं। -- रोज़ केन्नेडी
  • पतझड़ एक दूसरा बसंत ही तो है, जिसमें सारे पत्ते फूल बन जाते हैं। -- अल्बर्ट कामू (फ्रेंच विचारक)
  • पतझड़ एक दूसरे बसंत की तरह है जब सभी पत्तियां फूल बन जाती हैं। -- अल्बर्ट कैमस
  • पानी की याददाश्त उत्तम होती है,वो हमेशा वहीं जाने का प्रयास करता है जहाँ वो था। -- टोनी मोरिसन
  • पानी की याददाश्त भी कितनी कमाल की होती है। वह घूम फिरकर वहीं पहुंचता है जहां वह था। -- टोनी मॉरिसन (अमेरिकी उपन्यासकार और शिक्षिका)
  • पृथ्वी और आकाश, जंगल और मैदान, झीलें और नदियाँ, पहाड़ और समुद्र, ये सभी बेहतरीन शिक्षक हैं और हम में से कुछ को इतना कुछ सीखाते हैं जितना हम किताबों से नहीं सीख सकते। -- जॉन लुब्बोक
  • पृथ्वी फूलों में हंसती है। -- राल्फ वाल्डो एमर्सन
  • प्रकृति उपदेश देने से अधिक सीखाती है। शिलाओं पर धर्मोपदेश नहीं लिखे होते। पत्थरों से नैतिकिता की बातें निकालने से आसान है चिंगारी निकालना। -- जॉन बर्रोज़
  • प्रकृति कभी जल्दबाजी नहीं करती, फिर भी उसका सब काम होता है। -- लाओ त्जू (चीनी दार्शनिक)
  • प्रकृति की सभी चीजों में कुछ ना कुछ अद्भुत है। -- अरस्तु
  • प्रकृति को गहरी नजर से देखिए, तभी आप सब कुछ बेहतर समझ पाएंगे! -- अल्बर्ट आइंस्टीन (महान वैज्ञानिक)
  • प्रकृति माँ इस साल भले माफ़ कर दें, या अगले साल भी, पर अंत में वो आएँगी और आपको सजा देंगी। आपको तैयार रहना होगा। -- गेरालडो रिवेरा
  • प्रकृति में गहराई से देखिये, और आप हर एक चीज बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। -- ऐल्बर्ट आइन्स्टाइन
  • प्रकृति में बिताया गया हर पल आपको आपकी तलाश से अधिक हासिल कराता है। -- जॉन म्यूर (अमेरिकी प्रकृतिविद, जिन्हें ‘फादर ऑफ नेशनल पार्क भी कहा जाता है)
  • प्रकृति में, रोशनी से रंग बनता है। तस्वीर में रंग से रोशनी बनती है। -- हैंस हॉफमैन (जर्मन -- अमेरिकी चित्रकार)
  • फूल सबसे प्यारी चीजें हैं जिसे भगवान ने बनाया पर उसमे आत्मा डालना भूल गए। -- हेनरी वार्ड बीचेर
  • बसंत; प्रकृति का कहने का तरीका है कि,” चलो जश्न मनाएं!” -- रोबिन विल्लियम्स
  • बहुत सारे लोग सर पे बारिश की बूँद गिरने पर उसे कोसते हैं, और ये नहीं जानते की वही प्रचुरता में भूख मिटाने में वाली चीजें लेकर आती है। -- सेंट बैसिल
  • बारिश होते वक़्त जो सबसे अच्छी चीज आप कर सकते हैं वो ये है कि आप बारिश होने दें। -- हेनरी वाद्स्वर्थ लोंग्फेल्लो
  • मनुष्य ने आगे की चीजें देखने और अनुमान लगाने कि क्षमता गवां दी है। उसका अंत पृथ्वी का विनाश करने से होगा। -- ऐल्बर्ट स्च्वेत्ज़र
  • मेरा मानना है कि यदि कोई हमेशा आकाश की तरफ देखे तो उसके पर निकल आयेंगे। -- गुस्ताव फ्लाबर्ट
  • मेरा सोचना है कि मैं कभी एक पेड़ जितनी सुन्दर कविता नहीं देख पाऊंगा। -- जोयस किल्मर
  • मैं भगवान में विश्वास रखता हूँ, बस मैं उसे प्रकृति कहता हूँ। -- फ्रैंक लोयड राईट
  • मैंने जीवन में बहुत से तूफान देखे। कई ऐसे थे जो अचानक आए, और मुझे सिखा गए कि मौसम पर मेरा कोई अधिकार नहीं, और यह कि धैर्य एक विद्या है जो मुझे सीखनी है और प्रकृति का सम्मान करना है -- पाओलो कोएल्हो (ब्राजीलियन लेखन)
  • मैंने पूरी ज़िन्दगी वहां कांटे निकालने और फूल लगाने का प्रयास किया है जहाँ वो विचारों और मन में बड़े हो सके। -- अब्राहम लिंकन
  • यदि आकाश का नीलापन आपकी आत्मा को खुशियों से भर देता है, हरी घास के पत्तियों को निहारते हुए आपके अन्दर कुछ होता है, यदि कुदरत की छोटी-छोटी चीजें आपको संदेश देती प्रतीत होती हैं तो समझ लीजिए आपकी आत्मा जीवित है! -- एलियोनोरा ड्यूज
  • यदि आप प्रकृति माता से अभिभूत नहीं होते तो समझ लीजिए आपके अंदर कुछ गड़बड़ है। -- एलेक्स ट्रेबेक (कैनेडियन टेलीविजन होस्ट)
  • यदि आपको प्रकृति से सचमुच प्रेम है, तो सुंदरता आपको सर्वत्र दिखाई पड़ेगी। -- लॉरा इंगैल्स वाइल्डर (अमेरिकी लेखिका)
  • ये मत भूलो की धरती तुम्हारे पैरों को महसूस करके खुश होती है और हवा तुम्हारे बालों से खेलना चाहती है। -- खलील गिबरान
  • वो जो मधुमक्खी के छत्ते के लिए ठीक नहीं है वो मधुमक्खी के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता। -- मार्कस औरेलियस
  • वो सबसे धनवान है जो कम से कम में संतुष्ट है, क्योंकि संतुष्टि प्रकृति कि दौलत है। -- सुकरात
  • सभी चीजें कृत्रिम हैं, क्योंकि प्रकृति ईश्वर की कला है। -- थोमस ब्राउन
  • सभी फूल अपनी जड़ों की गहराइयों में प्रकाश रखते हैं। -- थीओडोर रोएथ्के
  • सिर्फ जीना ही काफी नहीं है, आपके के पास धूप, स्वतंत्रता और एक छोटा सा फूल भी होना चाहिए। -- हैंस एन्डरसन
  • हम मनुष्य के बनाए क़ानून तो तोड़ सकते हैं पर प्रकृति के नियमों को नहीं। -- जुल्स वेर्ने
  • हर पहाड़ में रास्ते होते हैं, मगर वे रास्ते घाटी में खड़े होकर नहीं दिखाई पड़ते। -- थियोडोर रेत्के (अमरीकी कवि)
  • हर फूल प्रकृति में खिली आत्मा है। -- गेरार्ड डी नेर्वल

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