धर्म का शाब्दिक अर्थ है 'धारण करने योग्य'। इसका सामान्य अर्थ 'कर्तव्य' है।

सूक्तियाँ

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  • धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ॥ -- मनुस्मृति
धारणा शक्ति, क्षमा, दम, अस्तेय (चोरी न करना), शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध – ये दस धर्म के लक्षण हैं ।
  • श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥
यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥ --महाभारत, शान्तिपर्व
धर्म का सार क्या है, यह सुनो और सुनकर उसे धारण भी करो! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये।
और अपने लिए जिन-जिन बातों की इच्छा हो वे दूसरों को भी मिलें, ऐसा सोचना चाहिये। अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये।
  • चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः। -- मीमांसासूत्र-१,१.२
प्रेरणा, धर्म का लक्षण और अर्थ है। (लोक-परलोक के सुखों की सिद्धि के लिये गुणों और कर्मों में प्रवृति की प्रेरणा धर्म का लक्षण है।)
  • यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः। -- वैशेषिक सूत्र
जिससे वर्तमान जीवन में अभ्युदय और भावी जीवन में निःश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि हो वही धर्म है। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि जिससे भौतिक उन्नति और अध्यात्मिक उन्नति दोनों प्राप्त होतीं हैं, वही धर्म है।
  • सुखस्य मूलं धर्मः।-- चाणक्य [१]
धर्म, सुख का मूल (जड़) है।
  • धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः।
यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥ -- महाभारत
'धर्म' शब्द 'धृ' अर्थात 'धारण करना' धातु से बना है। धर्म से ही सब प्रजा बँधी हुई है। यह निश्चय किया गया है कि जिससे (सब प्रजा का) धारण होता है वही धर्म है।
  • ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चित् शृणोति माम् ॥
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थ न सेव्यते ॥ -- वेदव्यास, महाभारत में
मैं बाँहें उठाकर लोगों को समझा रहा हूँ कि धर्म से ही अर्थ और काम की प्राप्ति होती है, इसलिए क्यों नहीं धर्म के मार्ग पर चलते? पर कोई मेरी सुनता ही नहीं।
  • न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ।
नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥ -- महाभारत, भारतसावित्री का चतुर्थ श्लोक
कामना से, भय से, लोभ से अथवा प्राण बचाने के लिये भी धर्म का त्याग न करे। धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धन का हेतु अनित्य।
  • नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥ -- भगवद्गीता
मनुष्यलोक में इस समबुद्धिरूप धर्म के आरम्भ का नाश नहीं होता। इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान महान् भय से रक्षा कर लेता है।
  • धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी न करना, इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले।
  • सुखार्थं सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ।
सुखं नास्ति विना धर्मं तस्मात् धर्मपरो भव ॥
सब प्राणियों की प्रवृत्ति सुख के लिए होती है, (और) बिना धर्म के सुख मिलता नहीं। इसलिए तू धर्मपरायण बन ।
  • तर्कविहीनो वैद्यः लक्षण हीनश्च पण्डितो लोके ।
भावविहीनो धर्मो नूनं हस्यन्ते त्रीण्यपि ॥
तर्कविहीन वैद्य, लक्षणविहीन पंडित, और भावरहित धर्म – ये अवश्य ही जगत में हंसी के पात्र बनते हैं ।
  • अस्थिरं जीवितं लोके ह्यस्थिरे धनयौवने ।
अस्थिराः पुत्रदाराश्च धर्मः कीर्तिर्द्वयं स्थिरम् ॥
इस अस्थिर जीवन/संसार में धन, यौवन, पुत्र-पत्नी इत्यादि सब अस्थिर है । केवल धर्म, और कीर्ति ये दो ही बातें स्थिर हैं।
  • स जीवति गुणा यस्य धर्मो यस्य जीवति ।
गुणधर्मविहीनो यो निष्फलं तस्य जीवितम् ॥
जो गुणवान है, धार्मिक है वही जीते हैं। जो गुण और धर्म से रहित है उसका जीवन निष्फल है ।
  • प्रामाण्यबुद्धिर्वेदेषु साधनानामनेकता ।
उपास्यानामनियमः एतद् धर्मस्य लक्षणम् ॥
वेदों में प्रामाण्यबुद्धि, साधना के स्वरुप में विविधता, और उपास्यरुप संबंध में नियमन नहीं – ये हि धर्म के लक्षण हैं ।
  • अथाहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेन्द्रिय संयमाः ।
दानमिज्या तपो ध्यानं दशकं धर्म साधनम् ॥
अहिंसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप और ध्यान – ये दस धर्म के साधन है ।
  • धर्मः कल्पतरुः मणिः विषहरः रत्नं च चिन्तामणिः
धर्मः कामदुधा सदा सुखकरी संजीवनी चौषधीः ।
धर्मः कामघटः च कल्पलतिका विद्याकलानां खनिः
प्रेम्णैनं परमेण पालय ह्रदा नो चेत् वृथा जीवनम् ॥
धर्म कल्पतरु, विषहर मणि, चिंतामणि रत्न है । धर्म सदा सुख देनेवाली कामधेनु है, और संजीवनी औषधि है । धर्म कामघट, कल्पलता, विद्या और कला का खजाना है । इस लिए, तूं उस धर्म का प्रेम और आनंद से पालन कर, वर्ना तेरा जीवन व्यर्थ है ।
  • अध्रुवेण शरीरेण प्रतिक्षण विनाशिना ।
ध्रुवं यो नार्जयेत् धर्मं स शोच्यः मूढचेतनः ॥
प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले, अनिश्चित शरीर के मुकाबले, निश्चित ऐसे धर्म को जो प्राप्त नहि करता, वह मूर्ख शोक करने योग्य है ।
  • पूर्वे वयसि तत्कुर्याधेन वृद्धः सुखं वसेत् ।
यावज्जीवेन तत्कुर्याद्येनामुत्रसुखं वसेत् ॥
यौवन में ऐसा करना चाहिए जिससे बुढ़ापा सुख से कटे। यह जीवन ऐसे जीना जिससे परलोक (या दूसरे जन्म) में चैन मिले ।
  • अस्थिरं जीवितं लोके ह्यस्थिरे धनयौवने ।
अस्थिराः पुत्रदाराश्च धर्मः कीर्तिर्द्वयं स्थिरम् ॥
इस जगत में धन, जीवन, यौवन अस्थिर हैं; पुत्र और स्त्री भी अस्थिर हैं । केवल धर्म और कीर्ति (ये दो ही) स्थिर है ।
  • उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं किमद्य सुकृतं कृतम् ।
आयुषः खण्डमादाय रविरस्तं गमिष्यति ॥
रोज उठकर “आज क्या सुकृत्य किया” यह जान लेना चाहिए, क्यों कि सूर्य (हररोज) आयुष्य का छोटा तुकडा लेकर अस्त होता है ।
  • अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत् ।
गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥
बूढापा और मृत्यु नहीं आयेंगे ऐसा समजकर विद्या और धन का चिंतन करना चाहिए । पर मृत्यु ने हमें बाल से जकड रखा है, ऐसा समजकर धर्म का आचरण करना चाहिए ।
  • जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम् ।
मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः ॥
धर्महीन मनुष्य को जिंदा होने के बावजुद मैं मृत समजता हूँ । धर्मयुक्त इन्सान मर कर भी दीर्घायु रहेता है उस में संदेह नहीं ।
  • अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ।
नित्य संनिहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसङ्ग्रहः ॥
शरीर अनित्य है; धन भी कायमी नहि है; और मृत्यु निश्चित है, इस लिए धर्मसंग्रह करना चाहिए ।
  • सकलापि कला कलावतां विकला धर्मकलां विना खलु ।
सकले नयने वृथा यथा तनुभाजां कनीनिकां विना ॥
जैसे इन्सान की आँखें कीकी के बिना निस्तेज है, वैसे हि धर्म की कला के बिना सभी कला व्यर्थ है ।
  • मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ ।
विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ॥
मृत शरीर को छोड़कर जैसे लकड़ी के टुकड़े चले जाते हैं, वैसे संबंधी भी मुँह फेरकर चले जाते हैं । केवल धर्म ही मनुष्य के पीछे जाता है ।
  • आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
आहार, निद्रा, भय और मैथुन – ये तो इन्सान और पशु में समान है । इन्सान में विशेष केवल धर्म है, अर्थात् बिना धर्म के लोग पशुतुल्य है ।
  • धर्मस्य फलमिच्छन्ति धर्मं नेच्छन्ति मानवाः ।
फलं पापस्य नेच्छन्ति पापं कुर्वन्ति सादराः ॥
लोगों को धर्म का फल चाहिए, पर धर्म का आचरण नहीं, और पाप का फल नहि चाहिए, पर गर्व से पापाचरण करना है !
  • सत्येनोत्पद्यते धर्मो दयादानेन वर्धते ।
क्षमायां स्थाप्यते धर्मो क्रोधलोभाद्विनश्यति ॥
धर्म सत्य से उत्पन्न होता है, दया और दान से बढता है, क्षमा से स्थिर होता है, और क्रोध एवं लोभ से नष्ट होता है ।
  • धर्मो मातेव पुष्णानि धर्मः पाति पितेव च ।
धर्मः सखेव प्रीणाति धर्मः स्निह्यति बन्धुवत् ॥
धर्म माता की तरह हमें पुष्ट करता है, पिता की तरह हमारा रक्षण करता है, मित्र की तरह खुशी देता है, और सम्बन्धियों की भाँति स्नेह देता है।
  • अन्यस्थाने कृतं पापं धर्मस्थाने विमुच्यते ।
धर्मस्थाने कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ॥
अन्य जगहों पे किये हुए पापों से धर्मस्थान में मुक्ति मिलती है, पर धर्मस्थान में किया हुआ पाप वज्रलेप बनता है ।
  • न क्लेशेन विना द्रव्यं विना द्रव्येण न क्रिया ।
क्रियाहीने न धर्मः स्यात् धर्महीने कुतः सुखम् ॥
क्लेश बिना द्रव्य नहीं, द्रव्य बिना क्रिया नहीं, क्रिया बिना धर्म संभव नहीं; और धर्म के बिना सुख कैसे हो सकता है?
  • वर्धत्यधर्मेण नरस्ततो भद्राणि पश्यति।
ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति॥ -- महाभारत, आरण्यक पर्व
अधर्म का आचरण करने से मनुष्य पहले बढ़ता है। इसके बाद धनादि ऐश्वर्य और प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है। उसके बाद शत्रुओं को भी जीतता है। अन्त में वह समूल नष्ट हो जाता है।
  • कथमुत्पद्यते धर्मः कथं धर्मो विवर्धते ।
कथं च स्थाप्यते धर्मः कथं धर्मो विनश्यति ॥ -- महाभारत
धर्म किससे उत्पन्न होता है? धर्म किससे बढ़ता है? और किससे धर्म स्थापित हो जाता है, तथा किससे धर्म विनष्ट हो जाता है?
  • सत्येनोत्पद्यते धर्मो दया दानेन वर्धते ।
क्षमया स्थाप्यते धर्मः क्रोध लोभाद विनश्यति ॥ -- महाभारत
धर्म, सत्य से उत्पन्न होता है। दया और दान से बढ़ता है। क्षमा से स्थापित हो जाता है। क्रोध और लोभ से विनष्ट हो जाता है।
  • अभावो वा प्रभावो वा यत्र नास्त्यर्थकामयोः।
समाजेष्वात्मरूपत्वं धर्मचक्र प्रवर्त्तनम्॥
जहां समाज में अर्थ का और कर्म का अभाव भी नहीं रहता और प्रभाव भी नहीं रहता तथा समाज में ही व्यक्ति का आत्मभाव रहता है, वहीं धर्मचक्र का प्रवर्तन होता है।
  • जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः ।
जानाम्यधर्मं न च मे निवॄत्तिः ॥ -- महाभारत
दुर्योधन कहते है कि ऐसा नहीं की धर्म तथा अधर्म क्या है यह मैं नहीं जानता था। परन्तु ऐसा होने पर भी धर्म के मार्ग पर चलना यह मेरी प्रवृत्ति नहीं थी और अधर्म के मार्ग से मैं निवृत्त भी नहीं हो सका ।
  • यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥4.7॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥4.8॥ -- गीता में श्रीकृष्ण
हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
साधु पुरुषों के रक्षण के लिये, दुष्कृत्य करने वालों के नाश के लिये, तथा धर्म की स्थापना के लिये, मैं प्रत्येक युग में प्रगट होता हूँ।।
  • जब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़इ असुर अधम अभिमानी।
तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा। हरहिं दयानिधि सज्जन पीरा॥ -- तुलसीदास
जब-जब धर्म की हानि होति है और असुर, अधम और अभिमानी बढ़ जाते हैं तब-तब दयानिधि प्रभु विविध शरीर धारण करके सज्जनों के दुख दूर करते हैं।
  • हम इह काज जगत मो आए।
धरम हेतु गुरुदेव पठाए॥
जहां-जहां तुम धरम बिथारो।
दुसट दोखियनि पकरि पछारो॥
याही काज धरा हम जनमे।
समझ लेहु साधू सब मनमे॥
धरम चलावन संत उबारन।
दुसट सभन को मूल उपारन॥ -- गुरु गोविन्द सिंह, 'विचितर नाटक' में

सनातन धर्म

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  • सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः ॥ -- मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 138
सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये। सत्य किन्तु अप्रिय नहीं बोलना चाहिये। प्रिय किन्तु असत्य भी नहीं बोलना चाहिये। यह सनातन धर्म है।
  • अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा।
अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः॥ -- महाभारत, शान्तिपर्व
मन, वाणी और कर्म से प्राणियों के प्रति सद्भावना, सब पर कृपा और दान यही सज्जनों का सनातन-धर्म है।
  • न हि वैरेण वैराणि शाम्यन्तीह कदाचन ।
क्षान्त्या वैराणि शाम्यन्ति एष धर्मः सनातनः ॥ -- उदानवर्ग, द्रोहवर्ग १४.११
इस संसार में वैर (वैमनस्य) का प्रतिकार वैर से करने से वैर का अन्त कभी भी नहीं होता है। उसका अन्त तो केवल वैर न कर सद्भाव पूर्ण व्यवहार से ही संभव है, यही सनातन धर्म है।
  • न हि वेरेण वेराणि सम्मन्तीध कुदाचनम् ।
अवेरेण च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो ॥ -- धम्मपद, यमकवग्ग
इस संसार में वैर (वैमनस्य) का प्रतिकार वैर से करने से वैर का अन्त कभी भी नहीं होता है। उसका अन्त तो केवल वैर न कर सद्भाव पूर्ण व्यवहार से ही संभव है, यही सनातन धर्म है।
  • आतुरे नियमो नास्ति बाले वृद्धे तथैव च ।
पराचाररते चैव एष धर्मः सनातनः ॥ -- महासुभाषितसंग्रह
रोगी के लिये, बालक के लिये, वृद्ध के लिये, और दूसरों का उपकार करने वालों के लिये (अपरिवर्तनशील) नियम नहीं है। (अर्थात इन सबके लिये नियम बहुत लोचपूर्ण हैं)।
  • अकॄत्यं नैव कर्तव्यं प्रााणत्यागेऽपि संस्थिते।
न च कॄत्यं परित्याज्यम् एष धर्मः सनातनः॥
प्राण संकट में होने पर भी अकरणीय कर्म नहीं करना चाहिए और करणीय कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, यह सनातन धर्म है।
  • हिन्दू धर्म है क्या? यह धर्म क्या है जिसे हम सनातन कहते हैं। यह हिन्दू धर्म मात्र इसलिये कहलाया क्योंकि यह हिन्दू राष्ट्र में बढा, क्योंकि इस प्रायद्वीप में यह समुद्र और हिमालय से घिरे होने के कारण एकान्त में विकसित हुआ,
क्योंकि इस पावन और प्राचीन भूमि में इसे युगों तक सुरक्षित रखने का कार्यभार आर्यजाति को सौंपा गया था। लेकिन यह किसी एक देश के सीमान्तों में सीमाबद्ध नहीं है। यह विश्व के किसी भी देश की सदा के लिये निजी बपौती नहीं है।
जिसे हम हिन्दू धर्म कहते हैं , वह वास्तव में सनातन धर्म है, क्योंकि यह सार्वभौमिक धर्म ही है जो अन्य सबको गले लगाता है। यदि कोई धर्म सार्वभौमिक नहीं है, तो वह सनातन नहीं हो सकता। एक संकीर्ण धर्म, साम्प्रदायिक धर्म ,
ऐकान्तिक धर्म का उद्देश्य और अवधि सीमित ही होती है। यही एकमात्र ऐसा धर्म है जो विज्ञान के आविष्कारों और दर्शनशास्त्र के चिन्तन को सम्मिलित करते हुए और उनका पूर्वानुमान करते हुए भौतिकवाद पर विजय पा सकता है।
यही एक मात्र वह धर्म है जो बराबर मानव जाति को यह कहता है कि भगवान् हमारे समीप हैं और उन तक पहुँचने के सभी सम्भव उपायों को अपनाता है। -- महर्षि अरविन्द

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