• कबिरा मन निर्मल भया , जैसे गंगा नीर ।
पीछे-पीछे हरि फिरै , कहत कबीर कबीर ॥ -- कबीर
  • चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥ -- रहीम
  • मन के हारे हार है मन के जीते जीत । -- अज्ञात
  • कबिरा यह तन खेत है मन बच करम किसान।
पाप पुन्य दुइ बीज हैं जोतैं बवैं सुजान॥ -- कबीरदास
  • नारद भव विरंचि सनकादी । जे मुनि नायक आतमवादी ॥
मोह न अन्ध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेही॥
तृष्णा केहि न कीन्ह बोराहा । केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥
ज्ञानी तापस सूर कवि कोविद गुन आगार
केहि कै लोभ विडम्बना कीन्हि न एहिं संसार॥
श्रीमदवक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि ।
मृगलोचनि के नैन सर को अस लागि न जाहि॥
गुनकृत सन्निपात नहिं केही । कोउ न मान मद तजेउ निबेही ॥
जोबनज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा ॥
यह सब माया कर परिवारा । प्रबल अमिति को वरनै पारा ॥
सिव चतुरानन जाहिं डेराहीं । अपर जीव केहि लेखे माहीं ॥ --- श्रीरामचरितमानस ,उत्तरकाण्ड दोहा ६९-७१
  • जैसे जल द्वारा अग्नि को शांत किया जाता है वैसे ही ज्ञान के द्वारा मन को शांत रखना चाहिये। -- वेदव्यास
  • मानव जितना अपने मन को मना सके उतना खुश रह सकता है। -- अब्राहम लिंकन
  • यदि आपने अपनी मनोवृतियों पर विजय प्राप्त नहीं की, तो मनोवृत्तियां आप पर विजय प्राप्त कर लेंगी। -- नेपोलियन हिल
  • जो मनुष्‍य अपने मन का गुलाम बना रहता है वह कभी नेता और प्रभावशाली पुरूष नहीं हो सकता। -- स्‍वेट मार्डन
  • माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥ -- कबीर
  • जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय ॥ -- कबीर
  • मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है। -- स्वामी विवेकानन्द
  • जैसा खाय अन्न, वैसा बने मन। -- अज्ञात
  • जो मन की शक्ति के बादशाह होते हैं, उनके चरणों पर संसार नतमस्तक होता है। -- अज्ञात
  • सभी बुरे कार्य मन के कारण उत्पन्न होते हैं। अगर मन परिवर्तित हो जाये तो क्या अनैतिक कार्य रह सकते हैं?-- गौतम बुद्ध


  • एक प्रखर, नियंत्रित और शांत मन संसार का सबसे शक्तिशाली अस्त्र है, जिसके सामने संपूर्ण ब्रह्माण्ड नतमस्तक है।” -- स्वामी विवेकानन्द
  • अच्छी तरह से वश में किया हुआ मन मनुष्य का सबसे अच्छा मित्र है। लेकिन, यदि यह अनियंत्रित है, तो मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन सिद्ध होता है। -- श्रीमद्भाग्वदगीता
  • मन को यदि एक बार वृहत विचारों की सीमा तक विस्तृत कर दिया जाय, तो यह कभी भी अपने मूल आकार में नहीं लौटता। -- ओलिवर वेन्डेल होल्म्स
  • मनुष्य भाग्य के कैदी नहीं हैं, बल्कि अपने स्वयं के मनों के कैदी हैं। -- फ्रेंक्लिन डी. रूज़वेल्ट
  • आपके पास एक बहुत शक्तिशाली मन है जो हर चीज़ को संभव बना सकता है, पर तभी जब तक आप स्वयं को केन्द्रित रख सकें। -- वायने डबलू. डायर
  • आपका मन (मस्तिष्क) एक पवित्र अहाता है जिसमे कोई भी हानिकारक चीज़ आपके प्रोत्साहन के बिना प्रवेश नहीं कर सकती। -- राल्फ वाल्डो एमर्सन
  • अंतर्ज्ञान से प्रदीप्त मन एक पावन उपहार है और विचारशील मन एक स्वामिभक्त सेवक है। हमने एक ऐसे समाज का निर्माण कर दिया है जो सेवक का तो सम्मान करता है और उपहार को भूल गया है। -- अल्बर्ट आइंस्टीन
  • लोग उतने ही प्रसन्न होते हैं जितना वे अपने मनों को तैयार कर लेते हैं। -- अब्राहम लिंकन
  • मन स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग बना सकता है। -- जॉन मिल्टन
  • मन का संवर्धन मानवीय अस्तित्व का परम उद्देश्य होना चाहिये। -- भीमराव अम्बेडकर
  • हमें अपने स्वयं के जीवन के रचयिता होने की आवश्यकता है। -- पीटर संगे
  • जिज्ञासा एक प्रखर मन के सबसे स्थायी और सुनिश्चित लक्षणों में से एक है। -- सैमउल जॉनसन
  • मन कोई ऐसा पात्र नहीं है जिसे भरा जाना है, बल्कि यह तो एक अग्नि है जिसे प्रज्वलित किया जाना है। -- प्लूटॉर्क
  • मन के लिये संवर्धन (जुताई) उतनी ही आवश्यक है जितना शरीर के लिये भोजन। -- सिसेरो
  • सहनशीलता मन का सबसे बड़ा उपहार है; यह मस्तिष्क से उसी प्रयास की माँग करता है जो साईकिल पर संतुलन साधने के लिये आवश्यक होता है। -- हेलेन केलर
  • एक मन जो सदैव नियोजित है हमेशा खुश है। यह सच्चा रहस्य है, आनंद का एक शानदार नुस्खा। -- थॉमस जेफ़र्सन
  • मन की पीड़ा शरीर की पीड़ा से ज्यादा बुरी है। -- लैटिन कहावत
  • एक मानसिक धब्बा न तो वक्त के साथ धुंधला हो सकता है और न ही किसी पानी से धोया जा सकता है। -- सिसेरो
  • मनुष्य का मन एक आइसबर्ग (बर्फ का एक विशाल टुकड़ा) की तरह है, जो अपने समूचे भार के सातवें हिस्से से पानी के उपर तैरता है। -- सिगमंड फ्रायड
  • पिता का स्थान आकाश से भी ऊँचा है, माता पृथ्वी से भी अधिक भारी है, और मन वायु से भी अधिक वेगवान है। -- महाभारत

इन्हें भी देखें

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