"वेद" के अवतरणों में अंतर

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* क्रत्वा चेतिष्ठो विशामुषर्भुत् ।*(ऋ० १/६५/५)
: प्रातः जागने वाला प्रबुद्ध होता है, उसे सब स्नेह करते हैं।
 
* (सोम) न रिष्यत्त्वावतः सखा ।*(ऋ० १/९१/८)
: हे सोम (परमात्मा) ! तेरा सखा कभी दुःखी नहीं होता।
 
* त्वं जोतिषा वि तमो ववर्थ ।*(ऋ० १/९१/२२)
: अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।
 
* पितेव नः श्रृणुहि हूयमानः ।*(ऋ० १/१०४/९)
: पुकारे जाने पर पिता की भाँति हमारी टेर सुनो।
 
* अघृणे न ते सख्यमपह्युवे ।*(ऋ० १/१३८/४)
: हे प्रभो ! तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता।
 
* दिप्सन्त इद्रिपवो नाह देभुः ।*(ऋ० १/१४७/३)
: दबाने वाले शत्रु उपासक को नहीं दबा सकते।
 
* न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ।*(ऋ० १/७/७)
: मैं प्रभु की स्तुति का पार नहीं पाता।
 
* यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ।*(अथर्व० ७/१८/२)
: जहाँ परमेश्वर की ज्योति है, वहाँ कल्याण ही है।
 
* मा श्रुतेन वि राधिषि ।*(अथर्व० १/१/४)
: हम सुने हुए वेदोपदेश के विरुद्ध आचरण न करें ।
 
* अपृणन्तमभि सं यन्तु शोकाः ।*(ऋ० १/१२५/७)
: लोकोपकारहीन कञ्जूस को शोक घेर लेता है।
 
* मा प्र गाम पथो वयम् ।*(ऋ० १०/५७/१)
: हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों ।
 
* त्वमस्माकं तव स्मसि ।*(ऋ० ८/१२/३२)
: प्रभो ! तू हमारा है, हम तेरे हैं।
 
* जाया तप्यते कितवस्य हीना ।*(ऋ० १०/३४/१०)
: जूएबाज की पत्नी दीन-हीन होकर दुःख पाती है।
 
* न स सखा यो न ददाति सख्ये ।*(ऋ० १०/११७/४)
: मित्र की सहायता न करने वाला मित्र नहीं होता।
 
* मात्र तिष्ठः पराङ् मनाः ।*(अथर्व० ८/१/९)
: इस संसार में उदासीन मन से मत रहो।
 
* अघमस्त्वघकृते ।*(अथर्व० १०/१/५)
: पापी को दुःख ही मिलता है।
 
* न स्तेयमद्मि ।*(अथर्व० १४/१/५७)
: मैं चोरी का माल न खाऊँ।
 
* असन्तापं मे ह्रदयम् ।*(अथर्व० १६/३/६)
: मेरा ह्रदयहृदय सन्ताप से रहित हो।
 
* उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः ।*(ऋ० १०/१३७/१)
: हे विद्वानो ! गिरे हुओं को ऊपर उठाओ।
 
* अहं भूमिमददामार्याय ।*(ऋ० ४/२६/२)
: मैं यह भूमि आर्यों को देता हूँ।
 
* मा भेर्मा संविक्थाऽऊर्जं धत्स्व ।*(यजु:० ६/३५)
: मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर ।कर।
 
* तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः-(१०/८/१)
 
* यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु -(७/८०/३०)
: हे प्रभु ! जिस शुभ इच्छा से हम तेरा आह्वान करें, वह हमारी पूर्ण हो।
 
* मा नो हिंसीः पितरं मातरं च -(अथर्व० ११/२/२९)
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