नृत्य

मानवीय अभिव्यक्ति तथा कला का एक स्वरूप
  • यस्यां गायन्ति नृत्यंति भूम्यां मर्त्यायैलिवाः ।
युद्धन्ते यस्यमा-न्दो यस्यां वदति दुन्दुभिः॥ -- अथर्ववेद
जिस भूमि में आनन्द के बाजे बज रहे हैं, जहाँ लोग प्रसन्नता से नाचते गाते हैं और वीर लोग उत्साह से अपने राष्ट्र की रक्षा में तत्पर हैं।
  • कवयति पण्डितराजे कवयन्त्यन्येऽपि विद्वांसः ।
नृत्यति पिनाकपाणौ नृत्यन्तन्येऽपि भूतबेतालाः ॥ -- महासुभषितसङ्ग्रह(९०९४)
यद्यपि अन्य विद्वान भी काव्यों की रचना करते है परन्तु जिस काव्य की रचना पण्डितों में राजा के समान श्रेष्ठतम विद्वान करते हैं वही काव्य सर्वोत्तम होता है। सर्वश्रेष्ठ नृत्य तो स्वयं पिनाकपाणि शिव का ही होता है, यद्यपि उनके गण भूत बेताल तथा अन्य व्यक्ति भी नृत्य करते हैं।
  • यदि आप नृत्य कर रहे हों, तो आप को ऐसा लगना चाहिए कि आप को देखने वाला कोई भी आस-पास मौजूद नहीं है। यदि आप किसी संगीत की प्रस्तुति कर रहे हों, तो आप को ऐसा प्रतीत होना चाहिये कि आप की प्रस्तुति पर आप के सिवा अन्य किसी का भी ध्यान नहीं है । और , यदि आप सचमुच में, किसी से प्रेम कर बैठें हों तो आप में ऐसी अनुभूति होनी चाहिए कि आप पहले कभी भी भावनात्मक तौर पर आहत नहीं हुए हैं। -- मार्क ट्वेन
  • उमा दारु जोषित की नाईं। सबहिं नचावत राम गोसाईं। -- रामचरितमानस
शंकर जी पार्वती से कहते हैं कि हे उमा! स्वामी श्री रामजी सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं।
  • नट मर्कट इव सबहिं नचावत, राम खगेस वेद अस गावत। -- रामचरितमानस
(काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि-) हे पक्षियों के राजा गरुड़! नट (मदारी) के बंदर की तरह श्री रामजी सबको नचाते हैं, वेद ऐसा कहते हैं।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें