• न कोई किसी का मित्र है और न कोई किसी का शत्रु। स्वार्थ से ही मित्र और शत्रु एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। -- वेदव्यास
  • कभी-कभी समय के फेर से मित्र शत्रु बन जाता है और शत्रु भी मित्र हो जाता है, क्योंकि स्वार्थ बड़ा बलवान है। -- वेदव्यास
  • स्वार्थ को सदा क्षमा कर देना चाहिये क्योंकि इसके इलाज की कोई सम्भावना नहीं है। -- Jane Austen, Mansfield Park (1814)
  • स्वार्थ ही असली अनीश्वरवाद है ; केवल महत्वाकांक्षा और निःस्वार्थ ही असली धर्म हैं। -- Israel Zangwill, Children of the Ghetto (Philadelphia, Jewish Publication Society of America, 1892), Book II, Chapter 16, p. 299.
  • सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥ -- रामचरितमानस
  • असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥ -- रामचरितमानस
असुरों को मदिरा और शिव को विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर (कौस्तुभ) मणि ले ली। तुम बड़े स्वार्थी हो। सदा कपट का व्यवहार करते हो।
  • स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥
सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा॥
जीव के लिए सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्म से श्रीराम के चरणों में प्रेम हो। वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीर को पाकर श्री रघुवीर का भजन किया जाए॥
  • प्रत्येक व्यक्ति वास्तव में समाज के वार्षिक राजस्व को जितना अधिक बढ़ा सकता है, उतना बढ़ाने के लिये श्रम करता है। उसका उद्देश्य जनता का हित करना नहीं होता है, न ही वह जानता है कि वह जानता है कि वह जनता का कितना हित कर रहा है। विदेशी उद्योग के बजाय घरेलू उद्योग का समर्थन करके वह अपनी ही सुरक्षा की पूर्ति करता है। उस उद्योग को वह इस प्रकार निर्देशित करता है कि उसके उत्पाद अधिकतम उपयोगी हों, इसमें भी उसका अपना लाभ निहित है। यहाँ भी उसे एक 'अदृश्य हाथ' चला रहा होता है ताकि वह वह कार्य कर सके जिसे करना उसका लक्ष्य नहीं है। -- आदम स्मिथ
  • स्वारथ के सब ही सगे, बिन स्वारथ कोउ नाहिं ।
जैसे पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ि जाहिं ॥
जिस प्रकार वृक्ष जब तक रसदार हो, पंछी उनका सेवन करते हैं और नीरस होते ही अन्यत्र प्रस्थान कर जाते हैं उसी प्रकार जब तक स्वार्थ सधता रहता है सभी सगे संबंधी हमारे बने रहते हैं परन्तु बिना स्वार्थ तो अपने भी पराये बन जाते है।
  • बिन स्वारथ कैसै सहै कोऊ करुए बैन।
लात खाय पुचकारियै होय दुधारू धैन॥ -- वृंद कवि
इस संसार की यह रीति है कि बिना स्वार्थ के कोई भी किसी के कड़ुवे वचनों को सहन नहीं करता है, अर्थात् अपने स्वार्थ को पूरा करने के कारण ही वह उसके विपरीत व्यवहार को भी सहन कर लेता है। जिस प्रकार यदि गाय दूध देने वाली होती है तो हम उसकी लात खाकर भी, उसे प्यार करते हैं, पुचकारते हैं, क्योंकि उससे हमारे स्वार्थ की सिद्धि होती है।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें