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सुभाषित वचन

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोय।
सहजै सब बिधि पाइये, जो मन जोगी होय॥

अर्थात् = शरीर से सभी योगी बन जाते हैं, परंतु मन से बिरला ही योगी बन पाता है। जो मन से योगी बनता है, वह सहज ही में सब कुछ पा लेता है।

कुलानि समुपेतानि गोभि: पुरुषतो अर्थात: ।
कुलसंख्यां न गच्छंति यानि हीनानि वृत्तत:॥

• अर्थात् : गौओं, मनुष्यों और धन से संपन्न होकर भी जो कुल सदाचार से हीन हैं, वे अच्छे कुलों की गणना में नहीं आ सकते।

दुविधा जाके मन बसै, दयावंत जिय नाहिं।
कबीर त्यागे ताहि को, भूलि देहि जनि बाहिं॥

-अर्थात जिसके मन में दुविधाएं बसी हों और हृदय में दया-भाव नहीं है, ऐसे मनुष्य का साथ फौरन ही छोड़ देना चाहिए।

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरेउ चटकाय।
टूटे तो फिर ना जुरै, जुरै गांठ परि जाय॥

- अर्थात् प्रेम रूपी धागे को कभी तोड़ने की कोशिश नहीं चाहिए, क्योंकि वह फिर से नहीं जुड़ता। जुड़ भी जाये तो रिश्ते में गांठ बना रहता है।

न देवा दण्डमादाय रक्षंति पशुपालवत्।
यं तु रक्षितुमिच्छंति बुध्दया संविभजंति तम्॥

- अर्थात् देवतागण चरवाहों की तरह डंडा लेकर पहरा नहीं देते। वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसे उत्तम बुद्धि से युक्त कर देते हैं।

कहैं इहै सब सुमृति, इहै सयाने लोग।
तीन दबावत निसक ही, पातक, राजा, रोग॥

- अर्थात् सारे वेद, स्मृतियां और ज्ञानी लोग यही बात बतलाते हैं कि राजा, रोग, और पाप, ये तीनों दुर्बल को दबाते-सताते हैं।

हांसी खैलो हरि मिलै, कौण सहै षरसान।
काम, क्रोध, त्रिष्णा तजै, ताहि मिलै भगवान॥

- अर्थात् यदि हंसते-खेलते भगवान मिले जाये, तो कौन कष्ट उठाने। भगवान तो तब मिलते हैं जब मन में काम, क्रोध और तृष्णा न रहे।

चंदा जायेगा, सुरज जायेगा, जायेगी धरणी अकासी।
पवन पाणी दोनूं ही जायेंगे, अटल रहे अविनासी॥

- अर्थात् यह संसार क्षणभंगुर है। एक दिन चांद, सूरज, धरती, आकाश, हवा, पानी सब नष्ट हो जायेंगे, सिर्फ अविनाशी ईश्वर ही विद्यमान रहेगा।

प्रीति रीति सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं।
कहै कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहिं ॥

- अर्थात् सांसारिक प्रेम-व्यवहार तो धन के लिए है, परमार्थ के लिए नहीं। इस भौतिक युग में तो कोई विरला ही परमार्थी होगा।

मन मुरीद संसार है, गुरु मुरीद कोई साध।
जो माने गुरु वचन को ताका मता अगाध॥

-अर्थात् कबीर कहते हैं, सांसारिक लोग मन के वंशीभूत हैं। गुरु का दास विरला ही होता है, जो गुरु के ज्ञान-वचनों का पालन करता है।

जब लगि भगति सकाम है, तब लगि निष्फल सेव।
कह कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी तज देव॥

- अर्थात् जब तक इच्छाओं से रहित भक्ति न हो, तब तक व्यक्ति के लिए परमात्मा को पाना असंभव है।

अनुबंधनं च सम्प्रेक्ष्य विपाकं चैव कर्मणाम्।
उत्थानमात्मनश्र्चैव धीर: कुर्वीत वा न वा॥

- अर्थात् धीर मनुष्य को चाहिए कि पहले कर्मों के प्रयोजन, परिणाम तथा अपनी उन्नति का विचार कर ले, फिर काम को शुरू करे।

लगन-लगन सब कोई कहे लगन कहावे सोय।
नारायण जा लगन में तन-मन दीजे खोय॥

- अर्थात् जिस लगन यानी जुनून में तन-मन-धन खो जाता है, वही असली लगन है। भक्ति के लिए यह लगन हो तो ईश्वर मिल जाये।

फूटी आंख विवेक की, लखे ना संत असंत ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महंत॥

- अर्थात् जिसकी ज्ञानरूपी आंखें फूटी हुई हैं, वह संत-असंत को कैसे पहचान सकता। वह तो दस-बीस चेलों वाले व्यक्ति को ही महंत समझ बैठता है।

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विंदति मानव:॥

-अर्थात् जिस परमेश्वर से सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है, उसकी अपने कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिध्दि को प्राप्त हो जाता है।

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षिष्यामि मा शुच:॥

-अर्थात् ईश्वर सभी जगह है, सजीव और निर्जीव दोनों में है। लेकिन अहं वाला व्यक्ति उसे न तो देख सकता है न तो मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगति साधु की, हरहि कोटि अपराध॥

- अर्थात् एक घड़ी क्या, अगर कोई आधी घड़ी भी साधु पुरुष की संगत में रहे ले, तो उसके करोड़ों अपराधों के दुष्फल नष्ट हो जाता हैं।

पतवारी माला पकरि, और न कछू उपाय।
तारि संचारि-पयोधि को, हरि नामैं करि नाव॥

- अर्थात् तू माला रूपी पतवार को पकड़ ले, क्योंकि और कोई उपाय नहीं। भगवान के नाम रूपी पतवार से ही तू इस भवसागर को तर सकता है।

भय से भक्ति करै सबैं, भय से पूजा होय।
भय पारस है जीव को, निरभय हो न कोय॥

- अर्थात् मनुष्य भय के कारण ईश्वर की पूजा करता है। भय को ही वह पारसमणि मानता है। यही कारण है कि वह निर्भय नहीं हो पाता।

जात-जात वित होय है ज्यों जिय में संतोष।
होत-होत त्यों होय तौ, हो धरी में मोष॥

-अर्थात् ज्यों-ज्यों धन हाथ से जाता है, मनुष्य मन मार कर संतोष करता है। धन के बढ़ने पर यदि मनुष्य ऐसा करे तो उसे क्षण में मोक्ष मिल जाये।

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्चरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥

- अर्थात् सब जगह परमात्मा को देखनेवाला एक विशेष आनंद में स्थित रहता है। वह आनंद हिंसा रहित है, क्योंकि वही आनंद अपना स्वरूप है।

ओछे बड़े न ह्वै सकै, लगौ सतर ह्वै गैन ।
दीरध होहि न नैक हू, झारि निहारै नैन ॥

- अर्थात् ओछा व्यक्ति कभी बड़ा नहीं हो सकता। जैसे आंखें फाड़ कर देखने से आंखें जरा बड़ी नही हो सकती।

वृद्धि: प्रभावस्तेजच्श्र सत्त्वमुत्थानमेव च।
व्यवसायच्श्र यस्य स्यात् तस्यावृत्तिभयं कुत:॥

- अर्थात् जिस व्यक्ति में आगे बढ़ने की शक्ति, प्रभाव, तेज, पराक्रम, उद्योग, और निश्चय है, उसे अपनी जीविका के नाश का भय नहीं रहता है।