"संस्कृत की सूक्तियाँ" के अवतरणों में अंतर

:बहुभिर्प्रलापैः किं त्रैलोक्ये सचराचरे ।
:यत्किञ्चिद्वस्तु तत् सर्वं गणितेन् बिना न् हि ।।
 
; गणितज्ञ (गणक) के गुण:
 
गणितसारसंग्रह के संज्ञाधिकार के अन्त में महावीराचार्य ने गणकों के ८ गुण गिनाए हैं-
 
अथ गणकगुणनिरूपणम्
 
लघूकरणोहापोहानालस्यग्रहणधारणोपायैः ।<br>
व्यक्तिकरांकविशिष्टैर् गणकोऽष्टाभिभिर् गुणैर् ज्ञेयः ।।<br>
( लघुकरण , उह , अपोह , अनालस्य , ग्रहण, धारण , उपाय, व्यक्तिकरांकविशिष्ट - इन आठ गुणों से गणक को जाना जाता है।)
 
Arrived at this point, my final translation is:<br>
“A mathematician is to be known by eight qualities: conciseness, inference, confutation, vigour in work and progress, comprehension, concentration of mind and by the ability of finding solutions and uncovering quantities by investigation.”
 
 
==सुभाषितानि ०१==
 
'''पुस्तक:'''
 
जलाद्रक्षेत्तैलाद्रक्षेद्रक्षेच्छिथिलबन्धनात् ।<br>
मूर्खहस्ते न मां दद्यादिति वदति पुस्तकम् ।।<br>
 
'Save me from water, protect me from oil and from loose binding,<br>
And do not give me into the hands of fools!' says the manuscript."
 
— Anonymous verse frequently found at the end of manuscripts
 
 
 
अगाधजलसंचारी न गर्वं याति रोहितः ।
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