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('* यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्। : स्वजनो श्वजनो माऽभूत्सकलं शकलं सकृत्शकृत्॥ :''(पुत्र! यदि तुम बहुत विद्वान नहीं बन पाते हो तो भी व्याकरण (अवश्य) पढ़ो ताक...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
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* यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
: स्वजनो श्वजनो माऽभूत्सकलं शकलं सकृत्शकृत्॥
 
:''(पुत्र! यदि तुम बहुत विद्वान नहीं बन पाते हो तो भी व्याकरण (अवश्य) पढ़ो ताकि 'स्वजन' 'श्वजन' (कुत्ता) न बने और 'सकल' (सम्पूर्ण) 'शकल' (टूटा हुआ) न बने तथा 'सकृत्' (किसी समय) 'शकृत्' (गोबर का घूरा) न बन जाय।)''
 
* यस्य षष्ठी चतुर्थी च विहस्य च विहाय च ।
: यस्याहं च द्वितीया स्याद् द्वितीया स्यामहं कथम् ॥
: अर्थ - जो पुरुष 'विहस्य' और 'विहाय' इन दोनों शब्दों को षष्ठी और चतुर्थी समझता है, 'अहम्' शब्द को द्वितीया समझता है, उसकी मैं कैसे पत्नी (द्वितीया) बन सकती हूँ?
 
* यदि व्याकरण को अच्छी त्रह समझ लिया जाय तो वह हमे अपनी बात को न केवल पूर्णता और स्पष्टता से कहने में सक्षम बनाता है बल्कि हमे यह भी शक्ति देता है कि हम ऐसे शब्द प्रयोग करें जिनका दूसरे लोग चाहकर भी कोई दूसरा अर्थ न निकाल सकें। -- William Cobbett in: A Grammar of the English Language: The 1818 New York First Edition Wih Passages Added in 1819, 1820, and 1823, Rodopi, 1983, p. 34
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