"ब्रह्मचर्य" के अवतरणों में अंतर

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'* मन, वाणी तथा शरीर से सदा सर्वत्र तथा सभी परिस्थितियों में सभी प्रकार के मैथुनों से अलग रहना ही ब्रह्मचर्य है। -- याज्ञवल्क्य * जो इस ब्रह्मलोक को ब्रह्मचर्य के द्वारा...' के साथ नया पृष्ठ बनाया
('* मन, वाणी तथा शरीर से सदा सर्वत्र तथा सभी परिस्थितियों में सभी प्रकार के मैथुनों से अलग रहना ही ब्रह्मचर्य है। -- याज्ञवल्क्य * जो इस ब्रह्मलोक को ब्रह्मचर्य के द्वारा...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
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