"महाभारत" के अवतरणों में अंतर

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: अर्थ : धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के विषय में जो भी ज्ञात है वह सब महाभारत में है। (किन्तु) जो यहाँ नहीं है वह कहीं नहीं है।
 
* महाभारत में, राज्याभिषेक के समय उपदेश में यह भी कहा गया है कि राजा को माली (मालाकार) के समान होना चाहिये न कि लकड़ी जलानेका कोयला बनाने वाले (आङ्गारिक) की तरह। माला सामाजिक समरसता का संकेत करता है, यह धार्मिक विविधता का रूपक है जिसमें विभिन्न रंगों के फूल मिलकर अत्यन्त सुखदायक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। उसके विपरीत लकड़ी जलानेका कोयला बनाने वाला पाशविक शक्ति का प्रतीक है जो विविधता को (जलाकर) एकरूपता में बदलता है, जिसमें जीवित पदार्थ को निर्जीव एकसमान राख में बदल दिया जाता है। -- राजीव मल्होत्रा, इन्द्राज नेट में ; राजीव मल्होत्रा निम्नलिखित श्लोक की बात कर रहे हैं-
:: मालाकारोपमो राजन् भव माङ्गारिकोपमः ।
:: तथायुक्तश्चिरं राष्ट्रं भोक्तुं शक्यसि पालयन् ॥
 
==इन्हें भी देखें==
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