गौतम बुद्ध

भारतीय दार्शनिक, सुधारक, बौद्ध धर्म के संस्थापक एवं प्रवर्तक
(भगवान बुद्ध से पुनर्निर्देशित)

गौतम बुद्ध (लगभग ५६३ - ४८३ ईपू) एक भारतीय दार्शनिक, शिक्षक और धर्म गुरु थे। "बुद्ध" अर्थात् "जागृत व्यक्ति" या "प्रबुद्ध व्यक्ति" एक पदवी है। शाक्यमुनि बुद्ध, जिनका मूल नाम सिद्धार्थ गौतम था, वे बौद्ध धर्म के प्रवर्तक थे।

आरोग्य परम लाभ है, संतुष्टि परम धन है,
विश्वास परम बंधु है, निर्वाण परम सुख है।(स्रोत)

उक्तियाँसंपादित करें

आत्मोत्थानसंपादित करें

  • परिनिर्वाण से पूर्व आनंद ने पूछा भगवान हम तथागत के अवशेषों का क्या करेंगे?इस पर बुद्ध ने कहा “तथागत के अवशेषों को विशेष आदर देकर खुद को मत रोको।धर्मोत्साही बनो,अपनी भलाई के लिए प्रयास करो।”
  • किसी जंगली जानवर की अपेक्षा एक कपटी और दुष्ट मित्र से ज्यादा डरना चाहिए,जानवर तो बस आपके शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, पर एक बुरा मित्र आपकी बुद्धि को नुकसान पहुंचा सकता है।
  • स्वास्थ्य सबसे बड़ा उपहार है,संतोष सबसे बड़ा धन है,वफ़ादारी सबसे बड़ा सम्बन्ध है।
  • जब महात्मा बुद्व से उनके एक शिष्य ने प्रश्न किया कि उनके प्रति सकारात्मक दृष्टि किस प्रकार हो,जो हमारे प्रति दर्भावना रखते हैं,तब बुद्वदेव ने जो उत्तर दिया था,वह स्मरणीय हैं- यदि तुम उस दुर्भावना को स्वीकार नहीं करोगे,जो अन्य व्यक्ति तुम्हारे प्रति भेजता हैं,तो वह दुर्भावना उसी व्यक्ति के पास बनी रहती है और तुम अप्रभावित बने रहे हो
  • हम जो सोचते है वो हम हैं।
    हम जो कुछ हैं वह हमारे विचारों से ही उत्पन्न होता है।
    अपने विचारों से हम सन्सार बनाते हैं।
  • कोई अन्य नहीं बल्कि हम स्वयं को बचाते हैं, कोई भी हमें बचा नहीं सकता और चाहिए भी नहीं। हमें पथ पर स्वयं चलना चाहिए और बुद्ध हमें मार्ग दिखाते हैं।
    • धम्मपद, अध्याय १६५
  • शक की आदत से भयावह कुछ भी नहीं है। शक लोगों को अलग करता है। यह एक ऐसा ज़हर है जो मित्रता ख़तम करता है और अच्छे रिश्तों को तोड़ता है। यह एक काँटा है जो चोटिल करता है, एक तलवार है जो वध करती है।
  • तीन चीजें जादा देर तक नहीं छुप सकती, सूरज, चंद्रमा और सत्य।
  • तुम अपने क्रोध के लिए दंड नहीं पाओगे, तुम अपने क्रोध द्वारा दंड पाओगे।
  • वह जो पचास लोगों से प्रेम करता है उसके पचास संकट हैं, वो जो किसी से प्रेम नहीं करता उसके एक भी संकट नहीं है।
  • हर इंसान अपने स्वास्थ्य या बीमारी का लेखक है।
  • कोई भी व्यक्ति सिर मुंडवाने से, या फिर उसके परिवार से, या फिर एक जाति में जनम लेने से संत नहीं बन जाता; जिस व्यक्ति में सच्चाई और विवेक होता है, वही धन्य है। वही संत है।
  • स्वास्थ्य सबसे महान उपहार है, संतोष सबसे बड़ा धन तथा विश्वसनीयता सबसे अच्छा संबंध है।
  • बूंद – बूंद से घड़ा भरता है।
  • अपनी मुक्ति के लिए काम करो. दूसरों पर निर्भर मत रहो।
  • पैर तभी पैर महसूस करता है जब यह जमीन को छूता है।
  • अपने बराबर या फिर अपने से समझदार व्यक्तियों के साथ सफ़र कीजिये, मूर्खो के साथ सफ़र करने से अच्छा है अकेले सफ़र करना।


गलत आरोपणसंपादित करें

  • हम जो सोचते हैं , वो बन जाते हैं।
    • थोमस बायरम (१९९३), शम्भाला प्रकाशन[१] द्वारा प्रदत्त।

संदर्भसंपादित करें

  1. थोमस बायरम (१९९३). धम्मपद (शम्भाला पॉकेट क्लासिक्स सं॰). शम्भाला प्रकाशन. ISBN 0-877739-66-8. 

बाह्य सूत्रसंपादित करें

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