• त्रयः उपस्तम्भाः । आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यं च सति ।
(शरीररुपी मकान को धारण करनेवाले) तीन उपस्तम्भ हैं; आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य (गृहस्थाश्रम में सम्यक् कामभोग) ।
  • आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषां अधिकोविशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥ -- महाभारत, शान्तिपर्व
भोजन, नींद, डर और वासना, पशु और आदमी दोनों में सामान्य है। आदमी का विशेष गुण धर्म है; धर्म के बिना वह एक पशु के समान है।
  • अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धुः कामातुराणां न भयं न लज्जा।
चिन्तातुराणां न सुखं न निद्रा क्षुधातुराणां न बलं न तेजः॥ -- गरुडपुराण
अर्थातुर के न मित्र होते हैं न बन्धु ; कामातुर को भय और लज्जा नहीं होती। चिन्ताग्रस्त को सुख व निद्रा नहीं होते; भूख से पीड़ित को न बल होता है न तेज।
  • षड् दोषाः पुरूषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ -- पञ्चतन्त्र
समृद्धि चाहने वाले मनुष्य को छः दोष समाप्त कर देने चाहिये- निद्रा, तन्द्रा (उंघना), भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता (काम को समप्त न करते हुए उसे खींचते रहना)
  • सुखं शेते सत्यवक्ता सुखं शेते मितव्ययी ।
हितभुक् मितभुक् चैव तथैव विजितेन्द्रिय: ॥ -- चरकसंहिता
सत्य बोलनेवाला, मर्यादित व्यय करनेवाला, हितकारक पदार्थ आवश्यक प्रमाण मे खानेवाला, तथा जिसने इन्द्रियों पर विजय पाया है , वह चैन की नींद सोता है।
  • काक चेष्टा बको ध्यानं स्वान निद्रा तथैव च।
अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम् ॥
विद्यार्थी मे ये पांच लक्षण हैं- कौवे की तरह जानने की चेष्टा, बगुले की तरह ध्यान, कुत्ते की तरह नींद, अल्पाहारी और गृह-त्यागी होना।
  • काव्यशास्त्र विनोदेन, कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणां, निद्रयाकलहेन वा॥ --
बुद्‌धिमान लोग अपना समय काव्य-शास्त्र अर्थात् पठन-पाठन में व्यतीत करते हैं जबकि मूर्ख लोगों का समय व्यसन, निद्रा अथवा कलह में बीतता है।
  • युक्ताहारविहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु।
युक्त स्वपनावबोधस्य योगो भवति दुःख हाः॥ -- भगवत्गीता
उस पुरुष के लिए योग दु:खनाशक होता है, जो युक्त आहार और विहार करने वाला है, यथायोग्य चेष्टा करने वाला है और परिमित शयन और जागरण करने वाला है।

इन्हें भी देखेंसंपादित करें