पण्डित दीनदयाल उपाध्याय (२५ सितम्बर १९१६ – ११ फ़रवरी १९६८) एक भारतीय राजनेता और संगठनकर्ता थे। वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे।

दीनदयाल उपाध्याय

उक्तियाँसंपादित करें

  • अंग्रेजी का शब्द 'रिलिजन', 'धर्म' के लिए सही शब्द नहीं है।
  • अनेकता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की सोच रही है।
  • अपने राष्ट्रीय पहचान की उपेक्षा भारत के मूलभूत समस्याओं का प्रमुख कारण है।
  • अवसरवाद ने राजनीति में लोगों के विश्वास को हिला कर रख दिया है।
  • अवसरवादिता ने राजनीति में लोगों के विश्वास को हिला दिया है।
  • आजादी सार्थक तभी हो सकती है जब यह हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का साधन बन जाए।
  • एक अच्छे को शिक्षित करना वास्तव में समाज के हित में है।
  • एक देश लोगो का समूह है जो एक लक्ष्य, एक आदर्श, एक मिशन के साथ जीते है और इस धरती के टुकड़े को मातृभूमि के रूप में देखते है यदि आदर्श या मातृभूमि इन दोनों में से कोई एक भी नही है तो इस देश का अस्तित्व नही है।
  • एक बीज, जड़ों, तानों, शाखाओं, पत्तियों, फूलों और फलों के रूप में अभिवयक्त होता है। इन सभी के अलग -अलग रूप, रंग और गुण होते हैं। फिर भी हम बीज के माध्यम से उनकी एकता के सम्बन्ध को पहचानते हैं।
  • एक राष्ट्र लोगों का एक समूह होता है जो 'एक लक्ष्य', 'एक आदर्श','एक मिशन' के साथ जीते हैं और एक विशेष भूभाग को अपनी मातृभूमि के रूप में देखते हैं। यदि आदर्श या मातृभूमि दोनों में से किसी का भी लोप हो तो एक राष्ट्र संभव नहीं हो सकता।
  • किसी सिद्धांत को ना मानने वाले अवसरवादी हमारे देश की राजनीति नियंत्रित करते हैं।
  • जब अंग्रेज हम पर राज कर रहे थे, तब हमने उनके विरोध में गर्व का अनुभव किया, लेकिन हैरत की बात है कि अब जबकि अंग्रेज चले गए हैं, पश्चिमीकरण प्रगति का पर्याय बन गया है।
  • जब राज्य सभी शक्तियों, दोनों राजनीतिक और आर्थिक का अधिग्रहण कर लेता है, तो इसका परिणाम धर्म का पतन होता है।
  • जब स्वाभाव को धर्म के सिद्धांतों के अनुसार बदला जाता है, तब हमें संस्कृति और सभ्यता प्राप्त होते हैं।
  • जब हमारे स्वाभाव धर्म के सिद्धांतो के जरिये बदलते है तब हमे संस्कृति और सभ्यता की प्राप्ति होती है।।
  • जबतक अंग्रेजो ने हमपर राज किया हमने उनका विरोध करना अपना गर्व समझते रहे लेकिन उनके चले जाने के बाद पश्चिमीकरण सभ्यता के जरिये हमारा विकास को अपनाना हमारा पहचान बन गया है।
  • जीवन में विविधता और बहुलता है लेकिन हमने हमेशा उनके पीछे छिपी एकता को खोजने का प्रयास किया है।
  • धर्म एक बहुत व्यापक अवधारणा है जो समाज को बनाए रखने के जीवन के सभी पहलुओं से संबंधित है।
  • धर्म के मौलिक सिद्धांत अनन्त और सार्वभौमिक हैं। हालांकि, उनके कार्यान्वयन का समय और स्थान परिस्थितियों के अनुसार भिन्न हो सकती है।
  • धर्म के लिए निकटतम समान अंग्रेजी शब्द ‘जन्मजात कानून’ हो सकता है। हालाँकि यह भी धर्म के पूरा अर्थ को व्यक्त नहीं करता है। चूँकि धर्म सर्वोच्च है, हमारे राज्य के लिए आदर्श ‘धर्म का राज्य’ होना चाहिए।
  • धर्म बहुत व्यापक अवधारणा है जो समाज को बनाए रखने के लिये जीवन के सभी पहलुओं से संबंधित है।
  • धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (मानव प्रयास के चार प्रकार) की लालसा व्यक्ति में जन्मगत होता है और इनमें संतुष्टि एकीकृत रूप से भारतीय संस्कृति का सार है।
  • धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की लालसा हर मनुष्य में जन्मजात होती है और समग्र रूप में इनकी संतुष्टि भारतीय संस्कृति का सार है।
  • नैतिकता के सिद्धांतों को कोई एक व्यक्ति नहीं बनाता है, बल्कि इनकी खोज की जाती है।
  • पश्चिमी विज्ञान और पश्चिमी जीवन शैली दो अलग-अलग चीजें हैं। चूँकि पश्चिमी विज्ञान सार्वभौमिक है और हम आगे बढ़ने के लिए इसे अपनाना चाहिए, लेकिन पश्चिमी जीवनशैली और मूल्यों के सन्दर्भ में यह सच नहीं है।
  • पिछले हजार वर्षो में हमने जो भी ग्रहण किया या जबरन थोपा गया या अपनी स्वेच्छा से ग्रहण किया अब उसे चाहकर भी नही छोड़ा जा सकता है।
  • बिना राष्ट्रीय पहचान के स्वतंत्रता की कल्पना व्यर्थ है।।
  • बीज की एक इकाई विभिन्न रूपों में प्रकट होती है – जड़ें, तना, शाखाएं, पत्तियां, फूल और फल। इन सबके रंग और गुण अलग-अलग होते हैं। फिर भी बीज के द्वारा हम इन सबके एकत्व के रिश्ते को पहचान लेते हैं।
  • भगवान ने हर आदमी को हाथ दिये हैं, लेकिन हाथों की खुद से उत्पादन करने की एक सीमित क्षमता है. उनकी सहायता के लिए मशीनों के रूप में पूंजी की जरूरत है।
  • भारत जिन समस्याओं का सामना कर रहा है उसका मूल कारण इसकी “राष्ट्रीय पहचान” की उपेक्षा है।
  • भारत में नैतिकता के सिद्धांतों को धर्म कहा जाता है – जीवन जीने की विधि।
  • भारतीय जीवन में अनेक विविधता और बहुलता देखने को मिलती है लेकिन हमे इनके पीछे छिपी एकता को खोजने का प्रयास करना चाहिये।
  • भारतीय संस्कृति की मौलिक विशेषता है कि यह जीवन को एक एकीकृत समग्र रूप में देखती है।
  • मानव की दोनों प्रवृतिया रही है जहा एक ओर लालच और क्रोध होता है तो दूसरी तरफ प्रेम और बलिदान की भावना समाहित होती है।
  • मानव प्रकृति में दोनों प्रवृत्तियां रही हैं – एक तरफ क्रोध और लोभ तो दूसरी तरफ प्रेम और त्याग।
  • मानवीय और राष्ट्रीय दोनों तरह से, यह आवश्यक हो गया है कि हम भारतीय संस्कृति के सिद्धांतों के बारे में सोचें।
  • मानवीय ज्ञान सभी की अपनी सम्पत्ति है।
  • मानवीय स्वभाव में दोनों प्रवृतियाँ हैं – क्रोध और लालच एक हाथ पर तो दूसरे पर प्यार और बलिदान।
  • मुसलमान हमारे शरीर का शरीर और हमारे खून का खून हैं।
  • यदि समाज का हर व्यक्ति शिक्षित होगा तभी वह समाज के प्रति दायित्वों को पूरा करने में समर्थ होगा।
  • यह जरुरी है कि हम ‘हमारी राष्ट्रीय पहचान’ के बारे में सोचते हैं, जिसके बिना आजादी’ का कोई अर्थ नहीं है।
  • यहाँ भारत में, व्यक्ति के एकीकृत प्रगति को हासिल के विचार से, हम स्वयं से पहले शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की चौगुनी आवश्यकताओं की पूर्ति का आदर्श रखते हैं।
  • ये ज़रूरी है कि हम “हमारी राष्ट्रीय पहचान” के बारे में सोचें जिसके बिना “स्वतंत्रता” का कोई अर्थ नहीं है।
  • रिलिजन शब्द का अभिप्राय पंथ या सम्प्रदाय से होता है इसका अर्थ धर्म तो कतई नही हो सकता है।
  • वहां जीवन में विविधता और बहुलता है लेकिन हमने हमेशा इसके पीछे की एकता को खोजने का प्रयास किया है।
  • विविधता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की विचारधारा में रची- बसी हुई है।
  • व्यक्ति को वोट दें, बटुए को नहीं, पार्टी को वोट दें, व्यक्ति को नहीं; सिद्धांत को वोट दें, पार्टी को नहीं।
  • शक्ति हमारे असंयत व्यवहार में नहीं बल्कि संयत कारवाई में निहित है।
  • शिक्षा एक निवेश है जो आगे चलकर शिक्षित व्यक्ति समाज की सेवा करेगा।
  • संघर्ष सांस्कृतिक स्वभाव का एक संकेत नहीं है बल्कि यह उनके गिरावट का एक लक्षण है।
  • समाज को हर व्यक्ति को ढंग शिक्षित करना होगा, तभी वह समाज के प्रति दायित्वों को पूरा करने में करने सक्षम होगा।
  • सिद्धांतहीन अवसरवादी लोगों ने हमारे देश की राजनीति का बागडोर संभाल रखा है।
  • स्वतंत्रता तभी सार्थक हो सकती है यदि वो हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का साधन बन जाए।
  • हम लोगों ने अंग्रेजी वस्तुओं का विरोध करने में तब गर्व महसूस किया था जब वे (अंग्रेज) हम पर शाशन करते थे, पर हैरत की बात है, अब जब अंग्रेज जा चुके हैं, पश्चिमीकरण प्रगति का पर्याय बन चुका है।
  • हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता हैं, केवल भारत ही नहीं. माता शब्द हटा दीजिये तो भारत केवल जमीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जायेगा।
  • हमारे देश में नैतिकता के सिद्धांतो को पालन करना धर्म कहा जाता है।
  • हमारे राष्ट्रीयता का आधार भारत माता है सिर्फ भारत नही,इसमें सिर्फ माता शब्द हटा लीजिये तो भारत मात्र एक जमीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जायेगा।।
  • हमे अपनी राष्ट्रीय पहचान के बारे में सोचना चाहिए तभी इस आजादी के महत्व को बनाया रखा जा सकता है।
  • हमे सही व्यक्ति को वोट देना चाहिए न की उसके बटुए को, पार्टी को वोट दे किसी व्यक्ति को भी नही, किसी पार्टी को वोट न दे बल्कि उसके सिद्धांतो को वोट देना चाहिए ।
  • हेगेल ने थीसिस, एंटी थीसिस और संश्लेषण के सिद्धांतों को आगे रखा, कार्ल मार्क्स ने इस सिद्धांत को एक आधार के रूप में इस्तेमाल किया और इतिहास और अर्थशास्त्र के अपने विश्लेषण को प्रस्तुत किया, डार्विन ने योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत को जीवन का एकमात्र आधार माना; लेकिन हमने इस देश में सभी जीवों की मूलभूत एकात्म देखा है।

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